अब्दुल्लापुर में सोगवारों ने बुधवार को एक नई मिशाल पेश की। आतंकवाद मुर्दाबाद के नारों के साथ तिरंगा तो लहरा ही रहा था साथ ही एक हिंदू छात्रा ने कविता पाठ किया। मौलाना की तकरीर से पहले छात्रा मानसी ने कविता पढ़ी तो सोगवार तिरंगा लहराते हुए हिंदुस्तान जिंदाबाद के नारे लगा रहे थे। युवाओं ने हिंदुस्तान को दूसरे मुल्कों से बेहतर देश बताते हुए कहा कि इस देश में हर मजहब को सम्मान मिलता है और इंसानियत का पैगाम इस देश की सरजमीं से ही निकला है।
अब्दुल्लापुर की रहने वाली 15 वर्षीय हिंदू छात्रा मानसी ने जुलूस में मौलाना की तकरीर से पहले देश प्रेम की कविता पढ़ी। इसकी शुरूआत उसने राष्ट्रीय ओज के कवि हरिओम पंवार की कविता ‘मैं दरबारों के लिए वंदन गीत नहीं गाती’ इसके बाद उसने अभय होकर बहे गंगा हमें यह विश्वास देना है, हिमालय को शहादत से धुला आकाश देना है’ से की। मानसी की कविता पर सोगवारों ने जमकर हिंदुस्तान जिंदाबाद के नारे लगाये। मानसी ने सोगवारों के बीच स्टूल पर खड़े होकर सौहार्द का संदेश दिया। इस दौरान उसे सोगवारों के साथ हिंदू समुदाय के लोग भी सुन रहे थे।
अली साहब ने भी इंसानियत के लिए दी थी कुर्बानी- मानसी
मानसी का कहना है कि अली साहब ने भी इंसानियत के लिए अपनी कुर्बानी दी थी। इसीलिए कविता में उनका जिक्र किया। मानसी की मानें तो उसी सोच में कोई मजहब नहीं, देश और इंसानियत है। मानसी हावर्ड प्लेस्टेड स्कूल में कक्षा 11 की छात्रा हैं। मानसी ने बताया कि वो हरिओम पंवार की कविताएं पढ़ती हैं लेकिन मोहर्रम के जुलूस में उसने कविताओं की लाइनों को अली साहब से जोड़कर उनकी शान में कविता तैयार की। उसे खुशी है कि उसके गांव में दोनों धर्मों के लोग बहुत प्यार से एक दूसरे के साथ रहते हैं। मानसी के पिता डॉ. टीकाराम अब्दुल्लापुर में ही रहते हैं। उन्हें गर्व है कि उनकी बेटी ने सौहार्द का संदेश देने के लिए कविता पाठ किया। टीकाराम कहते हैं कि उनकी बेटी ने इच्छा जताई तो उन्हें खुशी हुई कि बेटी ऐसा काम करना चाहती है। मोहर्रम कमेटी से जुड़े सैयद मेंहदी हसन का कहना है कि मानसी ने अली की शान में कविता लिखी थी। मानसी ने कविता पाठ करके एकता की मिशाल पेश की है। इससे पहले भी कई हिंदू उनकी मजलिसों में नौहाख्वानी कर चुके हैं।
आतंकवादियों का कोई मजहब नहीं : मेराज मेहंदी
अब्दुल्लापुर किला रोड़ पर मौलाना मेराज मेहंदी ने तकरीर की। उन्होंने कहा अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ महात्मा गांधी ने गुजरात से बगावत का बिगुल बजाया। पहले मौलाना हुसैन की शहादत का किस्सा पढ़ा। जिस तरह 72 लोगों को लेकर हुसैन साहब निकले थे, उसी तरह महात्मा गांधी भी नमक आंदोलन के लिए 72 आदमियों के साथ निकले। उन्होंने कहा कि आज आतंकवाद पूरी दुनिया के लिए नासूर है। हमें जाति, धर्म से ऊपर उठकर आतंकवाद से लड़ना है। आतंकवादी का कोई मजहब नहीं होता। सोगवारों ने आतंकवाद और आतंकी हाजी हाफिज सईद, अबू बकर बगदादी मुर्दाबाद के नारे भी लगाए।
खास है अब्दुल्लापुर की परंपरा
अब्दुल्लापुर शिया समुदाय बाहुल्य गांव हैं। यहां के जुलूसों का आयोजन और मातम चर्चित है, लेकिन अब यह चर्चा में आया है सोच के बदलाव से। पिछले साल यहां सोगवारों ने जुलूस में तिरंगा शामिल कर एक अलग संदेश दिया था। इसके बाद देश के कई स्थानों पर मुहर्रम के जुलूसों में तिरंगा नजर आया। मुख्य मार्ग पर ही लगा होर्डिंग शिया समुदाय की सोच को स्पष्ट कर देता है। इसमें कहा गया कि मुहर्रम आतंकवाद के खिलाफ आंदोलन का नाम है। बुधवार को नौहाख्वानी में हिंदुस्तान की सांस्कृतिक विरासत के बीच राम का नाम आना, दूसरे मजहब के लोगों को भी गले लगाकर उनको सम्मान देना बताया गया। नोहे में साफ कहा कि अंतिम समय में खुद मौलाना हुसैन हिंदुस्तान आना चाहते थे। यही नहीं जुलूस के दौरान हिंदुस्तान जिंदाबाद के नारे लगे तो आतंकवाद, आतंकी अबू बकर बगदादी, हाजी हफीज सईद के खिलाफ भी मुर्दाबाद के नारे लगाये गए।
इंसान नहीं, शैतान है आतंकवादी
मौलाना हुसैन साहब की शहादत में सोगवारों को मौलाना मेराज मेहंदी ने जो तकरीर दी, वह भी पूरी तरह आज के हालात पर थी। उन्होंने अपनी तकरीर में आतंकवाद को देश की एकता और अखंडता के लिए खतरा बताया। उन्होंने कहा कि इस्लाम में आतंकवाद की कोई जगह नहीं है। इस्लाम पीड़ित, कमजोर, मजलूम को सहारा देने की बात करता है। इस्लाम भाईचारा, एकता और अखंडता सिखाता है। आतंकवादी इंसान नहीं शैतान है। भारतीय सेना पर उन्होंने कहा कि अपने परिवार और घर से दूर सैनिक सरहदों की हिफाजत करते हैं। इन सैनिकों का हमें हौसला बढ़ाना चाहिए।