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स्कूलों के बाहर जाम, अभिभावक परेशान, नहीं किया इंतजाम

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मेरठ---वेस्ट एंड रोड स्थित स्कूल की छुट्टी के दोरान लगा जाम
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मेरठ। प्रदेश में मोटर व्हीकल एक्ट में बदलाव के विरोध में बुधवार को शहर में स्कूली बसों की हड़ताल से पूरी व्यवस्था चरमरा गई। हजारों परिजन और बच्चे बेहाल रहे। बच्चों को खुद लेकर आए परिजनों की स्कूलों के बाहर सुबह और दोपहर को भीड़ लगी रही। निजी वाहनों के कारण स्कूलों के बाहर घंटों जाम लगा रहा। वहीं पुलिस-प्रशासन की तरफ से जाम खुलवाने को कहीं कोई पुलिसकर्मी नहीं दिखा। आलम ये रहा कि 20 फीसदी परिजनों ने बच्चों को स्कूल ही नहीं भेजा। बृहस्पतिवार को भी हड़ताल के चलते यही हाल रहेगा।
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प्रदेश में नए मोटर व्हीकल एक्ट के तहत स्कूली बसों में बदलाव किए जाने के विरोध में एआईईईएफ की तरफ से बुधवार और बृहस्पतिवार को बसों की हड़ताल का एलान किया गया था। स्कूलों में बस चलाने वालों और स्कूल संचालकों का कहना है कि जो नियम बनाए हैं, उनके बाद ट्रांसपोर्ट व्यवस्था बहुत महंगी हो जाएगी। तय घोषणा के मुताबिक बुधवार को स्कूली बसें नहीं चलीं। अभिभावक परेशान रहे। शहर और ग्रामीण इलाकों में जो बच्चे बसों से स्कूल जाते हैं, उनको परिजनों को खुद सुबह छोड़कर आना पड़ा और दोपहर को लाना पड़ा। शहर में सबसे बुरा हाल वेस्ट एंड रोड पर रहा। सोफिया स्कूल चौराहे के साथ माल रोड पर घंटों वाहन जाम में फंसे रहे। छुट्टी होने से पहले और बाद तक घंटों यहां जाम लगा रहा। दिल्ली रोड, बागपत रोड, शास्त्रीनगर, जागृति विहार, गंगानगर, मोदीपुरम, कंकरखेड़ा, परतापुर, शताब्दीनगर समेत तमाम जगहों पर स्कूलों के बाहर यही हालात रहे।
परेशान परिजन बोले, काम करें या बच्चों को स्कूल छोड़ने-लेने जाएं
मेरठ। बसों की हड़ताल के कारण परिजन बेहद गुस्से में दिखे। वेस्ट एंड रोड पर बच्चों को लेने पहुंचे परिजनों ने कहा कि हर कोई मिडिल मैन को परेशान करने में लगा है। कोई बसों की हड़ताल कर देता है। कोई किसी भी दिन टेंपो वालों को डंडे मारकर बंद करा देता है। काम छोड़कर बच्चों को स्कूल लेकर आएं या फिर उनको घर बैठा लें।
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परिजनों ने कहा कि अगर बसें बंद ही हो गईं तो बच्चों को रोज स्कूल छोडे़ंगे-लेने आएंगे या काम करेंगे। मजबूर होकर टेंपो में भेजना पड़ेगा। कल को टेंपो भी बंद करा देंगे तो कैसे स्कूल भेजेंगे। अगर कोई कानून लागू किया जा रहा है तो उससे पहले विकल्प भी देना चाहिए। बस संचालक भी कम नहीं हैं। अगर बस में दो सीसीटीवी भी लगेंगे तो कितना खर्च आएगा। ज्यादा से ज्यादा छह हजार। एक बस में 40 बच्चे तक जाते हैं। एक बार में छह हजार को बांटकर उनसे ले सकते हैं। सीट बेल्ट पर भी एक ही बार खर्चा आएगा। प्रति छात्र सौ से दो सौ रुपये लगेंगे। फिटनेस और दूसरे संसाधनों की बात है तो वो तो जरूरी है। फिटनेस नहीं है तो वाहन चल क्यों रहे हैं फिर। ऐसे में साल में एक बच्चे पर तीन या चार सौ रुपये का खर्च बढ़ सकता है। लेकिन वे अब नए एक्ट की आड़ में दोगुना-तीन गुना पैसा लेना चाहते हैं। रही बात बस में महिला कंडक्टर की तो सुबह और दोपहर को ही बस चलती है। ऐसे में वह भी ऐसा नियम नहीं है कि पालन ही न हो सके।
अभिभावकों का दर्द
परिजनों ने कहा कि अफसरों के बच्चे तो सरकारी गाड़ियों में आते हैं। ड्राइवर और गनर उनको लेकर आते हैं। जो नौकरी कर रहे हैं, वे क्या करें। वेस्ट एंड रोड पर बच्चे को लेने पहुंचे एसपी सिंह ने कहा कि काम छोड़कर बच्चे को लेने आए हैं। इतनी बसें बंद अचानक दो दिन बंद कर दी गईं, लेकिन प्रशासन के किसी अधिकारी पर फर्क नहीं पड़ा। अभिभावक सपना ने कहा कि बच्चे का नुकसान न हो जाए, इस कारण खुद ही लेकर आना पड़ा। कपिल कुमार ने कहा कि अब बस संचालक पैसे बढ़ा देंगे, तो पढ़ाई का बोझ और बढ़ जाएगा। जीके शर्मा और राजीव जैन ने कहा कि बसों में सीसीटीवी, जीपीएस, सीट बेल्ट और महिला सहायक पर इतना खर्चा नहीं आने वाला, जितना ये सब बता रहे हैं। इसमें भी शोषण अभिभावकों का ही होगा। एनएएस कॉलेज के कार्यालय अधीक्षक अभिषेक भाटिया ने कहा कि बेटे शौर्य को छोड़ने के लिए अध्ययन गए और बेटी आराध्या को सेंट पैट्रिक्स छोड़ने जाना पड़ा। पूरी दिनचर्या बिगड़ गई। प्राचार्य से दोपहर को छुट्टी लेकर जाना पड़ा।
देहात में ट्रैक्टर से भी स्कूल गए बच्चे
देहात में भी बच्चे और परिजन बहुत परेशान रहे। कई गांवों से तो बसों के नहीं चलने के कारण बच्चों को परिजन ट्रैक्टर-ट्रॉली से स्कूल लेकर पहुंचे। परिजनों का कहना था कि जिला प्रशासन स्कूल संचालकों से वार्ता कर हड़ताल खत्म कराए।
आज भी जारी रहेगी हड़ताल
ऑल इंडिया एजूकेशन एंपावरमेंट फेडरेशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष लियाकत अली ने बताया कि मेरठ, मुजफ्फरनगर, बुलंदशहर, शामली, सहारनपुर, मोदीनगर, मुरादनगर, हापुड़, बरेली, मुरादाबाद समेत कई शहरों में स्कूली बसों की बुधवार को हड़ताल रही। बृहस्पतिवार को भी बसें नहीं चलेंगी। फेडरेशन के उपाध्यक्ष रविंद्रपाल सिंह का कहना है कि स्कूल संचालक परिजनों की लड़ाई लड़ रहे हैं। स्कूल संचालक नहीं चाहते कि परिवहन शुल्क में बेतहाशा वृद्धि हो। इस पॉलिसी के अनुसार ट्रांसपोर्ट पर खर्च प्रति छात्र छह हजार रुपये और वैन द्वारा करीब 4500 रुपये आएगा, जिसको वहन करना स्कूल व अभिभावकों के लिए संभव नहीं है।
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