बसपा सुप्रीमो मायावती के इस्तीफे के पीछे एक तीर से दो निशाना साधने की कवायद मानी जा रही है। अप्रैल 2018 में पूर्व मुख्यमंत्री मायावती का राज्यसभा में कार्यकाल समाप्त हो रहा है। इसके बाद सदन में जाने की संभावना नहीं दिखाई दे रही हैं। कारण, बसपा के पास महज 19 विधायक हैं, जो किसी भी सदस्य को राज्यसभा भेजने के लिए नाकाफी है। ऐसे में शब्बीरपुर प्रकरण के जरिए अपना इस्तीफा देकर मायावती ने चतुर सियासी दांव खेला है।
पूर्व मुख्यमंत्री मायावती के मंगलवार को राज्यसभा में सहारनपुर के शब्बीरपुर कांड को लेकर उठाई गई आवाज की गूंज यहां बसपा के गढ़ सहारनपुर में पहुंच गई है। मायावती को महज तीन मिनट दिए जाने को लेकर जो तीखी बहस हुई उससे सहारनपुर के सियासी हलके में हलचल है। अलबत्ता सहानुभूति की एक धीमी लहर बसपा सुप्रीमो मायावती की ओर भी है। जातीय हिंसा से सुलग चुके सहारनपुर में दो राहे पर खड़े दलितों तक रहनुमाई का संदेश देने की कवायद की है। राज्यसभा में तीखे तेवर के बाद इस्तीफे तक के सियासी घटनाक्रम के पीछे बसपा सुप्रीमो की मंशा दलितों को एकजुट करने और अपने गढ़ से अपने बेस वोट को साधने की है। शब्बीरपुर प्रकरण पर सदन में अपनी बात नहीं रख पाने से नाराज पूर्व मुख्यमंत्री ने इस्तीफे के जरिए बड़ा राजनीतिक दांव चला है।
बसपा के मजबूत गढ़ सहारनपुर में विधानसभा चुनाव में करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा था। इसके ठीक बाद 20 अप्रैल को पहले दलित-मुस्लिम संघर्ष और पांच मई को दलित-राजपूत संघर्ष से दलित सियासत तेज हो गई। राजनीतिक दलों के किसी भी दांव से पहले भीम आर्मी संगठन ने दलितों की रहनुमाई कर बसपा के गढ़ में उसे सीधी चुनौती दी। दलित वर्ग के बीच भीम आर्मी की लोकप्रियता ने न केवल बसपा बल्कि दूसरे राजनीतिक दलों को बैकफुट पर कर दिया। यही कारण है कि 23 मई को पूर्व मुख्यमंत्री मायावती सड़क मार्ग से सहारनपुर के हिंसा प्रभावित शब्बीरपुर गांव पहुंची थी, मगर उनकी वापसी के दौरान ही यहां हिंसा दोबारा भड़क गई थी। ऐसे में बसपा और उसकी मुखिया के सामने दलितों का दिल जीतने की चुनौती बनी हुई थी। उधर, भीम आर्मी की सक्रियता का फायदा कांग्रेस सहित दूसरी पार्टियां उठाने में जुटी थीं। दलित-मुस्लिम गठजोड़ में जुटी बसपा हर हाल में अपने बेस वोट को एकजुट करना चाहती है। मंगलवार को राज्यसभा में मायावती का आक्रामक तेवर और इस्तीफा भी उनकी राजनीतिक चाल मानी जा रही है। हालांकि यह दांव दलितों को साधने में कितना सटीक होगा, यह आने वाला वक्त बताएगा।
इस्तीफा देकर माया का बड़ा दांव
सहारनपुर में बवाल की फाइल फोटो
अपनी सियासी जमीन को मजबूत करने में जुटी बसपा दलित मतों के बिखराव को लेकर खासी चिंतित है। शब्बीरपुर प्रकरण के बाद देश भर में दलित उत्पीड़न की आवाज उठी और राजनीतिक दलों के बीच दलित सियासत भी शुरू हो गई। अपने बेस और बड़े वोट बैंक को साधने के लिए बसपा सुप्रीमो मायावती ने इस्तीफा देकर दलितों की सहानुभूति बटोरने का दांव चला है। ऐसे में यह सियासी मायनों में यह पूर्व मुख्यमंत्री का बड़ दांव माना जा रहा है।
बसपा का मजबूत गढ़ है सहारनपुर
दलित मूवमेंट से लेकर बसपा को सत्ता में पहुंचाने तक सहारनपुर की बड़ी भूमिका रही है। मायावती सहारनपुर के हरौड़ा वर्तमान में देहात सीट से चुनाव जीतकर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनी थी। बसपा के अस्तित्व में आने के बाद से जिले की सात में कम से कम चार सीट पर कब्जा भी रहा। मगर, इस विधानसभा चुनाव में बसपा यहां खाता भी नहीं खोल पाई। हिंसा में भीम आर्मी की दलितों में सक्रियता से बसपा को इसका नुकसान की भी आशंका है।
भीम आर्मी के जरिए भाजपा की घेराबंदी
दलितों की रहनुमाई कर रही भीम आर्मी भले ही खुद को राजनीति से अलग कर रही हो, मगर सियासी दल उसका इस्तेमाल करने से नहीं चूक रहे हैं। बसपा उसे भाजपा के साथ जोड़कर दलितों को एकजुट कर अपने पाले में लाना चाह रही है। बसपा को मालूम है कि बिना दलित मत एकजुट किए मुस्लिम उसके साथ नहीं आएगा। उधर, कांग्रेस दलितों में सेंधमारी के लिए भीम आर्मी के बीच सक्रिय होने की कोशिश में है। साथ ही मुस्लिम मतों को भी अपने पाले में किए रखने के लिए दलितों में सेंधमारी की सियासत की जा रही है।
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