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इस्लाम में हलाला की कोई शरई हैसियत नहीं : देवबंदी उलमा

Wed, 28 Mar 2018 04:26 PM IST
यूपी डेस्क, अमर उजाला, सहारनपुर
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फाइल फोटो
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सुप्रीम कोर्ट द्वारा मुस्लिम समुदाय में वर्षों से चली आ रही निकाह, हलाला और बहुविवाह की प्रथा की संवैधानिक वैधता का परीक्षण करने का निर्णय लिए जाने पर देवबंदी उलमा ने कड़ा एतराज जताया है। उलमा का कहना है कि इस्लाम में हलाला की शरई हैसियत नहीं है, जबकि शरीयत एक्ट के मुताबिक मर्द को बहुविवाह की इजाजत है। 

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इस मुद्दे पर प्रतिक्रिया देते हुए तंजीम उलमा-ए-हिंद के प्रदेशाध्यक्ष व अरबी के प्रसिद्ध विद्वान मौलाना नदीमुलवाजदी का कहना है कि पहले तीन तलाक के मामले में कोर्ट का फैसला आ चुका और सरकार इस पर कानून बना चुकी है। अब ये दूसरा मुद्दा छेड़ा जा रहा है। इसके पीछे इनका मकसद समान नागरिक संहिता के लिए रास्ता साफ करना है। 

उन्होंने कहा कि जहां तक हलाला का मसला है तो उलमा कई बार कह चुके हैं कि इस्लाम में हलाला कोई चीज नहीं है। यानि इस शर्त और नीयत के साथ औरत से शादी की जाएगी और उसको तलाक दी जाएगी कि फिर उसका निकाह पहले शौहर से हो जाएगा तो इस तरह का निकाह होता ही नहीं है। ये एक गलतफहमी है जो जान बूझकर फैलाई जा रही है।
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पढ़ें : साक्षी महाराज को छोड़कर सभी मानेंगे कोर्ट का फैसला : देवबंदी उलमा

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मौलाना नदीमुलवाजदी
उन्होंने कहा कि बस इतनी बात है कि अगर किसी औरत को तीन तलाक दे दी जाती है और वो किसी और मर्द से शादी कर लेती हैं फिर उसको वहां इत्तेफाकन तलाक मिल जाती है या फिर उस पति की मौत हो जाती है तो वो पहले शौहर से शादी कर सकती है। मौलाना वाजदी ने कहा कि जहां तक बहुविवाह का मसला है तो इसका हक मर्द को वर्ष 1937 में शरीयत एक्ट बना उसकी रूह से भी मुस्लिम मर्द अगर जरूरत हो और वो एक से ज्यादा बीवियों में इंसाफ कर सकता हो तो उसको बहुविवाह की इजाजत है। 

उन्होंने कहा कि अगर हमारी अदालतें शरीयत मामलों में हस्तक्षेप कर रही हैं तो ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और जमीयत उलमा-ए-हिंद अपने वकील अदालतों में खड़े करेंगे जो इस्लाम के हवाले से अपना रुख रखेंगे। उन्होंने यह भी कहा कि जान बूझकर शरीयती मामलों में हस्तक्षेप कर मुस्लिमों के साथ भेदभाव किया जा रहा है। ये मुल्क जो जम्हूरियत के नाम पर वजूद में आया है। इसमें सभी को अपने धर्म के मुताबिक जिंदगी जीने का अधिकार प्राप्त है।

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