‘दो-चार आतंकियों के लिए तो मैं अकेला ही काफी हूं’
- छुट्टी आने पर अनिल सुनाते थे कश्मीर के हालात की दास्तां
- सेना में जाकर देश सेवा का बचपन में ही कर लिया था फैसला
स्मृति शेष
जितेंद्र सिंह राणा
मेरठ। कद-काठी से जितने मजबूत उतने ही शांत स्वभाव। गांव के बड़े बुजुर्गों का सम्मान और बच्चों को प्यार देना। छुट्टी के दौरान खेती में पिता का हाथ बंटाना। ऐसा स्वभाव था शोपियां में शहीद हुए अनिल तोमर का। अनिल कभी छुट्टी पर आते तो मिले बिना नहीं रहते थे। कश्मीर के हालात पर उनसे हर बार चर्चा होती थी। अनिल बताते थे की भारतीय सेना पूरी मुस्तैदी से बार्डर पर तैनात है। बातचीत के दौरान इस सवाल पर कि आतंकी सामने आ गए तो क्या करोगे? कहते कि दो-चार आतंकियों के लिए तो मैं अकेला ही काफी हूं।
पहली कक्षा कक्षा से मेरे सहपाठी रहे अनिल में देशभक्ति का जज्बा कूट-कूट कर भरा था। कक्षा छह तक आते-आते अनिल ने सेना में भर्ती होकर देश सेवा का मन बना लिया था। पढ़ाई में होशियार अनिल शांत स्वभाव के थे। पढ़ाई के साथ-साथ उनकी रुचि खेलों में भी थी।
इस बार नवंबर में छुट्टी आए थे। अनिल बताते थे की सीमा पर जवान कैसे शून्य डिग्री से भी नीचे के तापमान में मुस्तैद रहते हैं। वे अपनी टीम के साथ विशेष आपरेशन के लिए जाते हैं। पड़ोसी अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहा है। सेना आतंकियों को मुंहतोड़ जवाब दे रही है। 17 दिसंबर को उनसे आखिरी मुलाकात हुई थी। मार्च-अप्रैल में आने का वादा करके गए थे।