बागपत में बदलते दौर का असर हरियाली तीज के त्योहार पर भी साफ दिखाई दे रहा है। एक दशक पहले तक तीज के कई दिन पहले ही गली-मोहल्लों और घरों में झूले पड़ जाते थे। महिलाएं समूह बनाकर तीज के गीत गाती थीं और सास-बहू एक-दूसरे को झूला झुलाकर त्योहार की खुशियां मनाती थीं।
घरों में पकवान बनाए जाते थे और महिलाएं एक-दूसरे के घर जाकर त्योहार की खुशियां बांटती थीं। अब समय के साथ त्योहार मनाने का तरीका बदला है और पारंपरिक झूले व गीत गाती महिलाओं की मंडलियां कम होती जा रही हैं। बागपत के जिला पंचायत में अमर उजाला की ओर से आयोजित संवाद में महिलाओं ने हरियाली तीज के पुराने और वर्तमान स्वरूप पर अपने विचार साझा किए।
एक महीने पहले शुरू हो जाती थीं तैयारियां
सावन के महीने में हरियाली तीज का विशेष महत्व माना जाता है। तीज के बाद ही त्योहारों का सिलसिला शुरू होता है। पहले महिलाएं इस पर्व की तैयारियां करीब एक महीने पहले से शुरू कर देती थीं। अंजलि और संगीता ने बताया कि घर में पकवान बनाने के साथ सिंधारा देने की तैयारियां भी शुरू हो जाती थीं। खासकर नई नवेली दुल्हन के लिए तीज का त्योहार बेहद खास होता था। परिवार और पड़ोस की महिलाएं मिलकर त्योहार की तैयारियां करती थीं।
दस दिन पहले पड़ जाते थे झूले
मुकेश देवी और सोनिया ने बताया कि पहले तीज से करीब दस दिन पहले ही झूले पड़ जाते थे और महिलाएं झूला झूलना शुरू कर देती थीं। पिंकी, सुनीता और पूजा ने बताया कि सास-बहू भी एक-दूसरे को झूला झुलाकर त्योहार की खुशियां मनाती थीं। गांवों में भी पेड़ों पर झूले पड़ते थे और महिलाएं समूह बनाकर तीज के गीत गाती थीं। अब शहर ही नहीं, देहात में भी झूले नजर नहीं आते। महिलाओं की गीत गाती मंडलियां भी पहले की तरह दिखाई नहीं देतीं।
एक-दूसरे के घर जाकर मनाती थीं तीज
राखी राजपूत ने बताया कि पहले झूला झूलने के लिए महिलाएं एक-दूसरे के घर जाती थीं। आपस में काफी प्रेमभाव रहता था और घर में बने पकवान भी एक-दूसरे को खिलाए जाते थे। समय बदला तो त्योहार मनाने का तरीका भी बदल गया।
मोबाइल ने बदली त्योहार की तस्वीर
मीनाक्षी सिसौदिया ने कहा कि पहले तीज का पर्व आपस में मिलकर मनाया जाता था। महिलाएं एक-दूसरे के घर से बुलाकर झूला झूलती थीं। अब मोबाइल ने बहुत कुछ बदल दिया है और कई बार त्योहार भी तस्वीर खींचने तक सीमित होकर रह जाता है।
डीजे की धुन में खो रहे तीज के पारंपरिक गीत
ममता प्रजापति ने कहा कि सामाजिक माध्यमों के बढ़ते प्रभाव से त्योहार की पारंपरिक रंगत फीकी पड़ रही है। पहले महिलाएं खुद तीज के गीत गाती थीं, लेकिन अब कई जगह डीजे की धुन पर नृत्य किया जाता है। इससे त्योहार में भारतीय संस्कृति की पारंपरिक झलक कम दिखाई देती है।
एक दशक में बदल गया त्योहार का स्वरूप
बबीता ने बताया कि एक दशक पहले तक गली, मोहल्लों और घरों में तीज से करीब दस दिन पहले ही झूला झूलना शुरू हो जाता था। महिलाएं तीज के गीत गातीं और नृत्य करती थीं। अब समय के बदलाव के साथ त्योहार मनाने का पूरा स्वरूप बदल गया है। पुराने समय की वह सामूहिकता और अपनापन अब पहले की तरह दिखाई नहीं देता।