- प्राचीन चंडी मंदिर में हुआ मेला नौचंदी की सुनहरी यादें कार्यक्रम
माई सिटी रिपोर्टर
मेरठ। सहयोग सामाजिक संस्था की ओर से मेला नौचंदी की सुनहरी यादें कार्यक्रम का आयोजन प्राचीन चंडी मंदिर में किया गया। कार्यक्रम में सत्तर और अस्सी दशक की मेले से जुड़ी पुरानी यादों को साझा करते हुए बीते दौर को याद किया गया।
अध्यक्षता कर रहे डॉ. प्रेम कुमार शर्मा ने बताया कि पहले नौचंदी मेले के दौरान शहर के सिनेमाघरों में रात 12 बजे से तीन बजे और सुबह तीन बजे से छह बजे तक अतिरिक्त फिल्मी शो चलाए जाते थे। इसके बावजूद टिकट मिलना बेहद मुश्किल होता था और दर्शक टिकट की तलाश में एक सिनेमाघर से दूसरे सिनेमाघर तक चक्कर लगाते रहते थे। उस समय मनोरंजन के साधन कम होने के कारण लोगों में मेले को लेकर जबरदस्त उत्साह रहता था।
कार्यक्रम का शुभारंभ मुख्य अतिथि अखिल भारतीय साहित्यालोक संस्था के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. सुबोध गर्ग ने मां चंडी को चुनरी ओढ़ाकर और ज्योति प्रज्ज्वलित कर किया। उन्होंने कहा कि नौचंदी मेला उत्तर भारत का सबसे बड़ा मेला है। यह हिंदू-मुस्लिम एकता और सांप्रदायिक सौहार्द का प्रतीक रहा है। उन्होंने कहा कि परंपरागत रूप से मेला होली के बाद दूसरे रविवार को शुरू होता था। अब यह परंपरा टूटती जा रही है। उन्होंने शासन और प्रशासन से मांग की कि अगले वर्ष से मेले का आयोजन उसके निर्धारित समय पर कराया जाए।
चंडी मंदिर के मुख्य पुजारी 86 वर्षीय महेंद्र कुमार शर्मा ने कहा कि चैत्र नवरात्र में मेला शुरू न होने से इसका स्वरूप विकृत हो गया है। उन्होंने धार्मिक संस्थाओं और मंदिरों के पुजारियों से एकजुट होकर मेले को निर्धारित समय पर कराने की मांग उठाने का आह्वान किया। पंडित सत्यपाल शर्मा ने चंडी मां की पूजा कराई और कहा कि चंडी मंदिर तथा सूफी संत बाले मियां की मजार का आमने सामने होना गंगा जमुनी तहजीब की अनूठी मिसाल है। संस्था अध्यक्ष दिनेश शांडिल्य ने बताया कि नौचंदी शब्द नवचंडी का अपभ्रंश है। उन्होंने कहा कि प्राचीन नवचंडी मंदिर में विराजमान मां चंडी, मां दुर्गा का उग्र रूप हैं जो दुष्टों का संहार कर भक्तों की रक्षा करती हैं।
विशिष्ट अतिथि कवयित्री सरोज दूबे ने कहा कि मेले का इतिहास रामायण काल से जुड़ा माना जाता है। बताया जाता है कि इस मंदिर का निर्माण रावण की पत्नी मंदोदरी ने कराया था। वह यहां नियमित पूजा करने आती थीं। पहले नवरात्र के दौरान लोग गाजे-बाजे के साथ मंदिर पहुंचकर मां चंडी को छत्र चढ़ाते थे और मेले का उद्घाटन माता की चौकी से होता था। डॉ. प्रेम कुमार शर्मा ने मेले में मिलने वाले कसेरू फल का उल्लेख करते हुए कहा कि बर्फ की सिल्ली पर ठंडा किया गया यह छोटा काला फल शरीर को शीतलता प्रदान करता था। लेकिन अब यह लगभग विलुप्त हो चुका है।
वैभव शांडिल्य ने कहा कि सर्कस मेले का प्रमुख आकर्षण होता था। इसमें हाथियों सहित अन्य जानवरों के करतब दर्शकों को रोमांचित करते थे। वहीं हेमंत सक्सेना ने बताया कि पहले मेले में लकड़ी के हिडोले चलते थे। जिन्हें मशीन नहीं बल्कि लोग स्वयं चलाते थे। कैलाशवती ने हास्य गैलरी हंसी के गोलगप्पे का जिक्र करते हुए कहा कि उसमें दिखाई जाने वाली अजीबोगरीब आकृतियां लोगों को खूब हंसाती थीं। संचालन दिनेश शांडिल्य ने किया। अंत में सागर सिंघल ने धन्यवाद ज्ञापित किया।
कैलाशवती ने हास्य गैलरी हंसी के गोलगप्पे का जिक्र करते हुए कहा कि उसमें दिखाई जाने वाली अजीबोगरीब आकृतियां लोगों को खूब हंसाती थीं। संचालन दिनेश शांडिल्य ने किया। अंत में सागर सिंघल ने धन्यवाद ज्ञापित किया।