जिले की महिलाओं ने घर खर्च में कटौती कर अपने बल पर शौचालयों का निर्माण कराया है। आज ये महिलाएं दूसरों के लिए नजीर बन गई हैं। इनका कहना है कि बहू और बेटियों की इज्जत घूंघट में नहीं, बल्कि खुले में शौच न जाने से बनती है।
स्वच्छ भारत अभियान से प्रेरणा लेकर ये खुद तो सफाई का महत्व समझ चुकी हैं, साथ ही अपने आसपास की महिलाओं को भी प्रेरित कर रही हैं। अपने गांव में ये सफाई की ब्रांड एंबेसडर बन गई हैं। इनकी इस पहल से पुरुष भी खासे प्रभावित हैं। वे भी इनका साथ दे रहे हैं।
मुश्किल था, लेकिन कर दिखाया
मेरठ की मलिन बस्ती दायमपुर में रहने वाली गीता के परिवार की मासिक आय कुल चार हजार रुपया महीना है। गीता कहती हैं इतने पैसों में घर चलाना मुश्किल है। शौचालय बनवाने की तो सोच भी नहीं सकती थी। लेकिन गर्भावस्था के दौरान खेत में पैर फिसल गया।
किसी तरह जिंदा बची। इसके बाद सोच लिया था कि पैसे जमा करके शौचालय बनवाऊंगी। गीता ने पति के साथ मिलकर रोजमर्रा के खर्चों में कटौती कर पैसे जोड़े। हर महीने 700 रुपये की बचत कर घर में पक्का शौचालय बनवाया। 350 परिवारों की बस्ती में रहने वाली गीता आज दूसरी महिलाओं को स्वच्छता का महत्व बता रही हैं। उनकी बातों से प्रभावित होकर अन्य महिलाएं भी सफाई और सेहत के लिए शौचालय बनवाने की राह पर चल पड़ी हैं।
इज्जत के सवाल का यही जवाब था
रजपुरा ब्लॉक निवासी सुंदर घरों में सफाई करती हैं। ये अपने इलाके में सुंदर आंटी के नाम से जानी जाती हैं। वे बताती हैं घर में दो जवान बेटियां थीं। पति शराब के नशे में धुत रहता था। ऐसे में बेटियों क ो दैनिक जरूरतों के लिए खेत में भेजने में मन डरता था। बेटियों की इज्जत पर आंच न आए, इसका कोई ख्याल पति को न था। लेकिन मैं मां हूं, मुझे तो सोचना था। बकौल सुंदर तीन साल पहले बेटी का रिश्ता तय हुआ था। तब महसूस हुआ कि घर में शौचालय बनवाना जरूरी है। कुछ बचत की, कुछ पैसे एडवांस लिए और स्वच्छता मिशन की मदद से शौचालय बनवाया।
स्वच्छता मिशन ने बदली सोच
सुंदर, गीता की तरह मेरठ अंबेडकर नगर बस्ती निवासी वंदना भी सफाई की ब्रांड एंबेसडर हैं। वंदना ने बच्चों की सुविधा, सेहत और स्वास्थ्य के लिए किसी तरह पैसे जोड़े। सारे खर्चों को दरकिनार करते हुए पहले घर में शौचालय की कमी को पूरा किया। आज वंदना सिर उठाकर कहती हैं मेरे घर में शौचालय है। हमें अपनी इज्जत का पूरा ख्याल है। वंदना से प्रेरणा लेकर बस्ती की दूसरी महिलाएं भी घर में शौचालय बनवाने की तरफ कदम बढ़ा चुकी हैं।
आशा बहुएं करेंगी जागरूक
प्रदेश सरकार ने हाल में गांवों में शौचालय निर्माण की प्रेरणा की जिम्मेदारी आशा बहुआें और आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को सौंपी है। आशा बहुएं गांव में महिलाओं को शौचालय इस्तेमाल के प्रति जागरूक करेंगी।
पिछले दो साल में बने शौचालय
जिला शौचालय निर्माण
बुलंदशहर 17,288
मेरठ 11,408
हापुड़ 8,381
बागपत 6,356
गाजियाबाद 3,825
गौतमबुद्ध नगर 1,125
कुल 47,278
(नोट - आंकड़े इंडिया वाटर पोर्टल से लिए हैं।)