60 रुपये प्रतिमाह किराये पर चला आश्रम
गांधी आश्रम के लिए लाला प्रसाद अयोध्या की कोठी को 60 रुपये मासिक किराये पर लिया गया। इसके बाद असौड़ा के जमींदार चौ. रघुवीर नारायण सिंह वर्तमान कार्यालय कोठी को 35 हजार नीलामी में प्राप्त करके गांधी आश्रम को समर्पित कर दिया। इसके बाद वर्ष 1969 में 35 हजार रुपये वापस करके गांधी आश्रम के नाम करा ली गई। गांधी आश्रम की स्थापना के समय जिन लोगों का समर्पण हुआ, उसमें मुख्य रूप से आचार्य जेबी कृपलानी के साथ पंडित जवाहर लाल नेहरु, बाबू शिवप्रसाद गुप्त, जमना लाज बजाब, चौ.रघुवीर नाराण सिंह शामिल रहे।
600 में से रह गए 71 कर्मचारी
गांधी आश्रम के इतिहास में तेजी से कर्मचारियों की संख्या घटती रही। कभी आश्रम में 600 कर्मचारी काम करते थे। आज यह संख्या मात्र 71 रह गई। वहीं, कारीगरों में सूत कातने वाले 650 और 48 बुनकर हैं। उन्होंने बताया कि हर वर्ष गांधी आश्रम चार करोड़ की आय सरकार को देता है। वहीं, जिले में छह स्थानों पर गांधी आश्रम का सामान बिकता है। जिसमें गढ़ रोड, घंटाघर, आपका बाजार, सुभाष बाजार, साबुन गोदाम, मवाना, किठौर, खरखौदा, सरधना में दुकानें खोली गईं हैं। - पृथ्वी सिंह रावत, गांधी आश्रम के मंत्री
तीन प्रकार का होता है चरखा
- पुस्तक चरखा - जिसे गांधी जी अपने पास रखते थे, इसका साइज छोटा होता है।
- पेटी चरखा - आमतौर पर इस चरखे से काम किया जाता है, अखंड चरखा यज्ञ में इसी का उपयोग किया जाएगा।
- यर्वदा चरखा - इस चरखे का उपयोग बड़े स्थानों पर किया जाता है।
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