सरकार की आंखों में धूल झोंकने के लिए निजी कंपनियां विदेशों से संचालित होने वाले सर्वर का सहारा ले रही हैं, जिसे पकड़ पाना बिना गहन जांच के किसी भी एजेंसी के लिए मुश्किल हो रहा है। सर्वर से जुड़ी वेबसाइट को कुछ इस तरह से डिजाइन किया गया है कि टैक्स चोरी का डाटा वेबसाइट पर अपलोड होने के बाद भी देखना असंभव है।
यही नहीं, अगर कारोबारी चाहे तो उसके एक इशारे पर सर्वर हैंडल करने वाली कंपनी डाटा पल भर में वेबसाइट से गायब कर देती है। सेंट्रल एक्साइज की डायरेक्ट्रेट जनरल ऑफ सेंट्रल एक्साइज इंटेलिजेंस (डीजीसीआई) विंग ऐसे दो मामलों की जांच में लगी है।
फरवरी और मार्च माह में डीजीसीआई ने गाजियाबाद में दो बिल्डिरों के ठिकानों पर छापा मारा था। विभाग के पास पुख्ता इनपुट था कि कारोबारियों ने करोड़ों रुपये की टैक्स चोरी की है, जिसको लेकर काफी रिकॉर्ड विभागीय अधिकारी पहले से जुटा चुके थे। ऐसी स्थिति में छापा मारकर टैक्स चोरी का सही पता लगाना था। विभागीय टीम ने फरवरी में पहली बार छापा मारा तो बिल्डर ने कहा कि हमारा सारा डाटा वेबसाइट पर ऑनलाइन है। आप दफ्तर के सभी कंप्यूटरों को देख सकते हैं।
अफसरों ने इन कंप्यूटरों पर करीब 24 घंटे तक माथापच्ची की, लेकिन उनके हाथ कुछ नहीं लगा। अफसर हैरत में थे कि जिस मुखबिर ने उन्हें कागज मुहैया कराये, उसके हिसाब से टैक्स चोरी चार से पांच करोड़ रुपये की बैठती है, लेकिन वेबसाइट पर सब कुछ दाखिल रिटर्न के हिसाब से सही है। ऐसी स्थिति में टीम दफ्तर के सभी सीपीयू फोरेंसिक जांच के लिए ले गई।
मोबाइल फोन से हुआ शक
मार्च माह के शुरूआत में डीजीसीआई ने गाजियाबाद से जुड़े एक अन्य बिल्डर की कंपनी पर छापा मारा। इस दौरान भी वेबसाइट पर सारा डाटा अपडेट था और उसमें कोई हेराफेरी नजर नहीं आ रही थी। इसी बीच टीम में शामिल अधिकारी को कंपनी के एक अधिकारी पर शक हुआ, जो बार-बार बाहर जाकर फोन कर रहा था। ऐसे में अफसरों ने उसका फोन कब्जे में ले लिया। उसे भी सीपीयू के साथ जब्त कर लिया गया।
फोन ने खोली पोल
डीजीसीआई के सूत्रों के अनुसार जब्त किया गया मोबाइल फोन काफी महंगा था, जो सर्वर से जुड़ा था। जांच में पता चला कि जिस वेबसाइट के जरिये कंपनी सारा रिकार्ड दुरुस्त रखती है, उसका सर्वर सिंगापुर में है। वेबसाइट को कुछ इस तरह से डिजाइन किया गया है कि उसमें रिकॉर्ड को दो फॉरमेट में रखा जा सकता है। यानी एक में लीगल रिकार्ड और दूसरे में दो नंबर का डाटा। ऐसे में जब भी चाहो, एक फोन कॉल पर सर्वर से तुरंत डाटा हटाया जा सकता है।
मोबाइल फोन पर ही सेकेंड फॉरमेट
सूत्रों के अनुसार जिस समय छापा मारा गया, उसके दस मिनट के दरम्यान में ये दोनों फॉरमेट इस मोबाइल फोन पर चल रहे थे। इनमें से एक फॉरमेट तो कंप्यूटर से कनेक्ट मिला जबकि दूसरा फॉरमेट केवल उसी मोबाइल फोन पर चलाया जा रहा था, जिसे जब्त किया गया था। यह मोबाइल फोन सीधे आईटी कंपनी से कनेक्ट था। इसमें भी खास बात यह रही कि मोबाइल से लिंक जो दूसरे कंप्यूटर का आईपी एड्रेस मिला, वह दफ्तर से जब्त किए गए कंप्यूटर से ही मेल नहीं खा रहा था। यानी कंपनी कहीं दूसरी जगह से इन दोनों नंबरों से कारोबार चलाया जा रहा था। सूत्र बताते हैं कि कंपनी के अफसर से जब तक मोबाइल फोन छीना गया, वह दो नंबर का डाटा दूसरे फॉरमेट से हटवा चुका था, जो बाद में रिकवर किया गया। डीजीसीआई ने दोनों मामलों की जानकारी मुख्यालय को दी है।
मुश्किल है ऐसे सर्वर को पकड़ना
- वेबसाइट को खास एप्लीकेशन से किया गया डिजाइन
- दो फॉरमेट में वेबसाइट होने से टैक्स चोरी हुई आसान
- वेबसाइट विदेश से संचालित होने के चलते पल भर में डाटा उड़ाना आसान
- कुछ आईटी कंपनियां ऐसी वेबसाइट तैयार कर मुहैया करा रहीं सेवा
- तमाम कारोबारी टैक्स चोरी छिपाने के लिए ले रहे ऐसी वेबसाइट का सहारा