इस मामले में भी विजिलेंस ने एसपी ओझा का दोषी माना है। तीसरे मामले में उन्हें राजनीतिक विज्ञान विभाग के डॉ. संजीव शर्मा को रीडर के पद पर आठ वर्ष की सेवा पूर्ण नहीं होने के बावजूद प्रोफेसर पद नाम हेतु पदोन्नति देने में दोषी पाया गया है। चौथे मामले में विजिलेंस ने एसपी ओझा को रिटायर कुलसचिव एएन सेठ को विशेष कार्याधिकारी के पद पर नियुक्त करने के मामले में पद का दुरुपयोग कर भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1988 के तहत दोषी मानते हुए एफआईआर दर्ज कराई है। बता दें कि डॉ. एसपी ओझा के खिलाफ सच संस्था के अध्यक्ष एडवोकेट संदीप पहल द्वारा राज्यपाल से शिकायत किए जाने पर संज्ञान लिया गया था।
मूल्यांकन घोटाले के बाद सुर्खियों में आए थे ओझा
डॉ. एसपी ओझा ने साल 2005 में चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय के कुलपति के तौर पर कार्यभार ग्रहण किया। साल 2006 में विश्वविद्यालय की कापियां आगरा में कूड़े के ढेर में मिलने के बाद हंगामा खड़ा हो गया था। प्रोेफेशनल कोर्सों की इन कॉपियों को आठवीं तक के बच्चों द्वारा जांचा जा रहा था। सच्चाई सामने आने के बाद मेरठ विश्वविद्यालय में हंगामा खड़ा हो गया था। छात्रों ने कुलपति के इस्तीफे की मांग करते हुए आंदोलन किया लेकिन कुलपति को पूरे मामले में क्लीन चिट मिल गई थी। साल 2008 में सच संस्था के अध्यक्ष एडवोकेट संदीप पहल ने एसपी ओझा पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाते हुए राज्यपाल से शिकायत की थी। 3 सितंबर 2008 को संदीप पहल ने राज्यपाल से मिलकर उन्हें एक सीडी सौंपी थी। इसमें संदीप पहल ने मीडिया को बताया था कि सीडी में एसपी ओझा रिश्वत लेते नजर आ रहे थे। सीडी राजभवन पहुंचने के बाद 4 सितंबर 2008 को एसपी ओझा से राज्यपाल ने इस्तीफा मांग लिया था। पूरे प्रकरण में शिकायतकर्ता डॉ. संदीप पहल का कहना है कि विजिलेंस को जल्द से जल्द विवेचना पूरी करके एसपी ओेझा को गिरफ्तार करना चाहिए। इसके साथ ही जो भ्रष्टाचार किया गया है, उसकी रिकवरी की जानी चाहिए। कुलपति के पद पर रहते हुए एसपी ओझा ने जिन कर्मचारियों और प्रोफेसर को लाभ दिया, वे भी कार्रवाई की जद में आ सकते हैं।
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