चुनाव चाहे लोकसभा का हो या विधानसभा का। आदर्श चुनाव आचार संहिता के उल्लंघन का कोई केस दर्ज न हो, ऐसा कभी देखने को नहीं मिला। लेकिन हैरानी की बात यह है कि चुनाव खत्म होते ही इस तरह के उल्लंघन के मुकदमे फाइलों में दफन होकर रह जाते हैं। न तो कभी इन मामलों में किसी आरोपी की गिरफ्तारी की बात सुनी गई और न कोई ठोस विवेचना। कुछ मामले तो आश्वासनों पर ही दम तोड़ देते हैं।
वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव में आचार संहिता उल्लंघन के 21 मामले अलग-अलग थानों में दर्ज हुए थे। जिसमें बसपा, समाजवादी पार्टी, कांग्रेस और भाजपा के नेता और कार्यकर्ता शामिल थे। उसके बाद 2014 के लोकसभा चुनाव में आचार संहिता के नौ मुकदमे दर्ज हुए थे। इन मुकदमों की विवेचना संबंधित थाने के एसआई को दी गई। लेकिन जैसे ही चुनाव प्रक्रिया पूरी होने पर आचार संहिता हटी तो ये मुकदमे भी ठंडे बस्ते में चले गए। आरोप लगते हैं कि कुछ नेता पुलिस से साठगांठ कराकर इन मुकदमों में अपना बचाव करा लेते हैं। आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर भी आचार संहिता लगी हुई है। जिसमें अभी तक जिले में आचार संहिता उल्लंघन के नौ मामले दर्ज हो चुके हैं।
नहीं होती गिरफ्तारी
ऐसे मुकदमों में पुलिस गिरफ्तारी की बात तो करती है। लेकिन गिरफ्तारी के बाद बवाल का अंदेशा जताकर पुलिस अपने कदम खींच लेती है। पुलिस का मानना है कि किसी भी प्रत्याशी या बड़े नेता की गिरफ्तारी से चुनाव प्रभावित हो सकता है।
कायम रहता है दबाव
आचार संहिता लगने के बाद पुलिस शांतिभंग में कार्रवाई करती है। जिनमें बवाली लोगों के थाना स्तर पर मुचलके पाबंद करा दिए जाते है। इस चुनाव में अब तक आठ हजार से अधिक लोगों को मुचलका पाबंद किया जा चुका है। जिन्हें मजिस्ट्रेट के यहां से जमानत करानी पड़ती है। लेकिन जिनके खिलाफ आचार संहिता के मुकदमे दर्ज किये जाते है, उन पर चुनाव आयोग की सख्ती दिखाकर पुलिस प्रशासन दबाव में जरूर रखता है। धारा 144 का उल्लंघन, बिना परमिशन के चुनावी रैली कराना, धर्मविरोधी भाषण देना, किसी को प्रलोभन देने के लिए धन व अन्य सामान बांटना जैसे मामलों में यह मुकदमे दर्ज किए जाते हैं।
कैबिनेट मंत्री और भाजपा सांसद भी हैं आरोपी:
पुलिस के मुताबिक इस चुनाव के मद्देनजर आचार संहिता के जो मुकदमे दर्ज हुए हैं। उनमें उन्नाव से भाजपा सांसद साक्षी महाराज और प्रदेश में कैबिनेट मंत्री शाहिद मंजूर भी आरोपी हैं। इसके अलावा कुछ स्थानीय नेता और प्रत्याशी हैं।
सरकार नहीं करती पैरवी
ऐसे मामलों में विवेचक चाहे तो गिरफ्तारी कर सकता है। चुनाव के बाद आयोग तो वापस चला जाता है, इसलिए ऐसे मुकदमों की पैरवी का जिम्मा सरकार का होता है। लेकिन सरकार विशेष कारणों के चलते पैरवी न होने पर ऐसे मुकदमों में कोई कार्रवाई नहीं होती। -अमित दीक्षित, वरिष्ठ अधिवक्ता
करते हैं सख्त कार्रवाई
आचार संहिता के उल्लंघन के मामले में पुलिस सख्त कार्रवाई कर रही है। विवेचना के बाद ही गिरफ्तारी की जाती है। पुराने मामलों में भी पुलिस ने कार्रवाई की है।- श्रवण कुमार सिंह, नोडल अधिकारी चुनाव सेल