सिस्टम की लेटलतीफी के कारण 21 वर्षीय युवक की जान चली गई। चार महीने पहले किडनी ट्रांसप्लांट के लिए आवेदन किया गया था। परिजनों ने कई बार स्वास्थ्य विभाग से लेकर सरकारी कार्यालयों के चक्कर लगाए, लेकिन फाइल पर मुहर नहीं लगी। जब फाइल पास हुई तब तक बहुत देर हो चुकी थी।
अहमदनगर निवासी मो. सुहेल (21) पुत्र सलीम की जून में तबियत खराब हुई थी। इलाज के बाद चिकित्सकों ने कहा कि उसकी दोनों किडनी खराब हैं। तत्काल ट्रांसप्लांट कराने की जरूरत है। चिकित्सक ने डोनर तैयार करनी की सलाह दी, जो ब्लड रिलेशन में हो। उसके बाद फाइल जिला स्वास्थ्य विभाग के माध्यम से स्वीकृति करानी होगी। फाइल स्वीकृति होने के बाद ही ट्रांसप्लांट किया जा सकता है। सुहेल की परिवार की मदद कर रहे काजी जमील बताते हैं कि अगस्त में फाइल लगाई। सलीम का बड़ा भाई 23 वर्षीय शादाब किडनी डोनेट लिए तैयार हो गया। इसके बाद फाइल चक्कर काटती रही। अधिकारियों ने कभी भी फाइल को रिजेक्ट नहीं किया था। हर बार कुछ न कुछ नया जोड़ देते थे। उन्होंने डोनर की पत्नी के माता-पिता (सास व ससुर) से भी शपथ पत्र मांगा था। लेकिन शपथ पत्र पूरे होने से पहले ही 9 नवंबर को सुहेल की मौत हो गई। काजी जमील ने अधिकारियों पर लापरवाही और देरी करने का आरोप लगाया।
पांच बार हुई वीडियो रिकॉर्डिंग
किडनी डोनेट की फाइल की चार महीने में पांच बार वीडियो रिकार्डिंग की गई। 13 अक्तूबर को फाइल रिजेक्ट कर दी गई थी, लेकिन नवंबर के पहले हफ्ते में कुछ शर्तों के साथ स्वीकृति दे दी गई। काजी जमील कहते हैं कि डोनर की पत्नी द्वारा कुछ आपत्ति जताई जा रही थी, लेकिन उसने कभी सामने आपत्ति नहीं जताई। अगर उसकी आपत्ति से फाइल रोकी जा रही थी तो फिर उसमें इतना वक्त नहीं लगना चाहिए था। समय रहते दूसरा डोनर तैयार किया जा सकता था।
किडनी डोनेट की ये है प्रक्रिया
किडनी ट्रांसप्लांट के लिए संबंधित मरीज और चिकित्सक को डीएम की अध्यक्षता में गठित कमेटी से स्वीकृति लेनी होगी। इसमें देखा जाता है कि किडनी डोनेट करने में कोई पैसे का लेन-देन तो नहीं है। या फिर किसी को धमकाकर किडनी डोनेट तो नहीं कराई जा रही है। चिकित्सक अपनी तरफ से यह जानकारी देता है कि मरीज को ट्रांसप्लांट की आवश्यकता है। इसके साथ ही डोनर से जुड़े तमाम कागजात लगाये जाते हैं। फाइल तैयार कर एडीएम सिटी (जिलाधिकारी प्रतिनिधि) के पास जाती है। यहां से फाइल संबंधित थाना क्षेत्र के सीओ व एसडीएम को जाती है। अगर यहां से रिपोर्ट सही आती है तो उसे बाद फाइल सीएमओ दफ्तर जाती है। यहां देखा जाता है कि एचएलए टाइप (एंटीजन) डोनर और मरीज के मेल खाते हैं या नहीं। क्योंकि 50 फीसदी एंटीजन मेल खाने पर ही ट्रांसप्लांट की स्वीकृति दी जा सकती है। उसके बाद मानसिक रोग विशेषज्ञ की रिपोर्ट को देखा जाती है जो डोनर से संबंधित होती है। रिपोर्ट में मानसिक रोग विशेषज्ञ यह सर्टिफाइड करता है कि डोनर मानसिक तौर पर स्वस्थ है और वह डोनेट कर सकता है। उसके बाद फाइल डीएम के पास जाती है, जहां पर एक कमेटी सभी लोगों से बात करती है। इसी बीच एक शर्त यह भी कि अगर डोनर शादीशुदा है तो उसकी पत्नी से शपथपत्र लिया जाता है और डोनर पत्नी है तो उसके पति से शपथपत्र लिया जाता है। अगर सब कुछ ठीक होता है तो स्वीकृति दे दी जाती है।