यह है पूरा विवाद
इस जमीन के मालिकाना हक को लेकर वन विभाग और गांव वालों के बीच सालों से विवाद चल रहा है और नहर का विवाद 2016 में वन विभाग के हक में फैसला होने से पुराना है। जमीन के मालिकाना हक से जुड़े दो दस्तावेज होते हैं। गजट और नक्शा। सिंचाई विभाग के अफसरों के अनुसार वन विभाग के दोनों दस्तावेज राज्यपाल से अनुमोदित होते हैं।
गजट में रामपुर ठकरा की 254 बीघा जमीन में से 5.2 हेक्टेअर जमीन किसानों के नाम दर्ज थी। जबकि मानचित्र में पूरी जमीन को वन विभाग की ही दर्शाया गया था। वन विभाग के गजट के अनुसार जमीन का सीमांकन नहीं किया गया था। सिंचाई विभाग ने जमीन को किसानों की मानते हुए उसे खरीद किसानों से खरीदा। तब जमीन पर कब्जा भी किसानों का ही था।
बाद में डीएम के निर्देश पर हुई जांच में सही हुए मानचित्र से पता चला कि जमीन वन विभाग के नाम ही है। वन विभाग की एक हेक्टेअर जमीन पर नहर बन चुकी थी। नहर की जितनी विवादित टुकड़ा वह 44 किलोमीटर लंबी नहर में मात्र 150 मीटर है।
बन रही पक्की नहर
परियोजना में बनने वाली मुख्य नहर 44 किलोमीटर लंबी है। यह नहर पूरी तरह पक्की बनाई गई है। जिले में पानी की कोई कमी नहीं है। इसलिए एक एक बूंद पानी दूसरे जिलों में पहुंचाने के लिए नहर पक्की बनी है। अमरोहा, बदायूं में कहीं कहीं भूगर्भ जल का स्तर 200 फीट तक पहुंच गया है। भूगर्भ को रिचार्ज करने व फसलों की सिंचाई के लिए यह नहर बनाई गई है।
जल्दी मंजूर होने की उम्मीद
सिंचाई विभाग के जेई कविराज सिंह का कहना है कि वन विभाग को मध्य गंगा नहर परियोजना से जुड़ी जमीन को स्थानांतरित करने के लिए प्रस्ताव भेजा गया है। जल्दी ही इसके मंजूर होने की उम्मीद है।
अफसरों को कराया अवगत
डीएफओ डा.एम सेम्मारन का कहना है कि पूरे मामले से आला अफसरों को अवगत करा दिया गया है। अफसरों के निर्देश पर ही आगे का काम किया जाएगा।