1. बैम्बूसा बालकोआ : इस प्रजाति का तना 16 से 20 मीटर लंबा एवं 8 से 10 सेंटीमीटर व्यास वाला होता है। इसका उपयोग भवन निर्माण, सीढ़ी, अगरबत्ती की डंडी, कागज, पल्प-लुग्दी बनाने में होता है।
2. बैम्बूसा टुल्डा : इसका तना 7 से 23 मीटर लंबा और 5 से 10 सेंटीमीटर व्यास वाला होता है। इसका उपयोग खिलौने, चटाई, टोपी, टोकरी आदि बनाने में होता है। अरुणाचल प्रदेश में इससे बांसुरी व छड़ी बनाई जाती है।
3. डैन्ड्रोकैलेमस जाइजैन्टियस : इसे जॉइंट बैम्बू अर्थात भीमकाय बांस कहा जाता है। हाथी का पसंदीदा भोजन होने की वजह से इसे हाथी बांस भी कहते हैं। इसकी लंबाई 24 से 30 मीटर व व्यास 20 से 30 सेंटीमीटर होता है।
4.बैम्बूसा बैम्बूस : इसकी लंबाई 15 से 30 मीटर तथा व्यास 15 से 18 सेंटीमीटर तक होता है। इसे कांटा बांस भी कहा जाता है। नमी एवं पोषक तत्वों से भरपूर नदी के किनारों, घाटियों में यह बांस अच्छी तरह से पनपता है।
5. डैन्डरोकैलेमस एस्पर : पश्चिमी तराई और पूर्वोतर राज्यों में पाया जाने वाला ये बांस 20 से 35 मीटर लंबा और 10 से 20 सेंटीमीटर व्यास का होता है। इसे खाने वाले बांस के नाम से भी जाना जाता है। नाल वृद्धि के समय तेज हथियार द्वारा मुख्य राइजोम से इसे अलग कर लिया जाता है।
वन अनुसंधान केंद्र बरेली के रिठानी क्षेत्र के रेंजर बीएस बिष्ट ने कहा कि किसान केंद्र में आकर बांस प्रजातियों के बारे में जानकारी ले सकते हैं। इन्हें खेत की मेड़, परती भूमि एवं ग्राम समाज की भूमि में रोपकर अतिरिक्त आय प्राप्त कर सकते हैं।
अनुसंधान केंद्र रिठानी के उपराजिक विधानचंद्र, मिशन प्रभारी वन दरोगा हरिकेश, सूरज सिंह बिष्ट और कर्मचारी आफताब रोजाना पॉली हाउस और ग्रीन हाउस में पौधों का निरीक्षण करते हैं। संजय वन में डैन्ड्रोकैलेमस एस्पर प्रजाति की सैटम तैयार करने का श्रेय इन्हीं को जाता है।
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