रासायनिक खाद, कीटनाशक दवाओं के प्रचलन, शहरीकरण के साथ मोबाइल टावर से निकलने वालीं तरंगें पक्षियों के अस्तित्व को खत्म कर रही हैं। यही कारण है कि कौवे की संख्या दिनों दिन घटती जा रही है। पेड़-पौधे कट रहे हैं, जिसके कारण इनके रहने के स्थान कम हो रहे हैं।
गांव के बाहर, सड़क के किनारे मरे जानवर सड़ते रहते हैं। इनको खाने वाले गिद्ध, चील और कौए दूर तक नजर नहीं आते हैं। वर्तमान समय में कौवा भी पक्षियों की संकटग्रस्त प्रजातियों में सम्मिलित हो गया है। इसमें काला कौवा तो एकदम गायब हो रहा है।
शोध में यह हुआ खुलासा
डा़ सिंह ने छह माह के शोध के बाद बताया कि कौवे के अंडे का सुरक्षा कवच कैल्यिशम कार्बोनेट की कठोर परत से बना होता है। मगर रासायनिक खादों के प्रयोग से खेतों का पानी जहरीला होता जा रहा है। प्यास लगने के दौरान जब कौवा पानी पीता है तो रासायनिक तत्व कौवे के शरीर में चले जाते हैं, जो कौवे के प्रजनन के बाद अंडे के सुरक्षा कवच काे कमजोर बना देते हैं। यही कारण है कि समय से पहले ही अंडे का सुरक्षा कवच टूटकर नष्ट हो जाता है। इससे कौवा की संख्या लगातार घट रही है।
श्राद्ध पक्ष में ढूंढे नहीं मिलते कौवे
लगातार कौवे की संख्या घट रही है, जिस कारण श्राद्ध पक्ष में लोगों को कौवे ढूंढे नहीं मिल रहे हैं। ऐसे में लोगों को श्राद्ध का भोजन अथवा प्रसाद गायों को देना पड़ रहा है। पंचवटी मंदिर के पुजारी कुंदन भारद्वाज का कहना है कि श्राद्ध में कौवे को छत पर जाकर अन्न-जल देना बहुत ही पुण्य का कार्य माना जाता है।
हमारे पितृ कौवे के रूप में आकर श्राद्ध का अन्न ग्रहण करते हैं। इस पक्ष में कौवों को भोजन कराना अर्थात अपने पितरों को भोजन कराना माना गया है, लेकिन अब कौवे नहीं मिल रहे तो लोगों ने गायों को ही भोजन देना शुरू कर दिया है।
कौवा पर्यावरण के लिए बहुत ही जरूरी है। बदलते परिवेश से कौवे अब शहरों को छोड़कर ग्रामीण क्षेत्रों में सिमट गए हैं। इनकी संख्या कम होती जा रही है। वन विभाग ने कभी इनकी गणना तो नहीं कराई है। -सुनेन्द्र सिंह वन क्षेत्राधिकारी बड़ौत।