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EXCLUSIVE: चौंका देगा सरकारी स्कूलों में 'मिड-डे मील' का हाल, अमर उजाला ने की पड़ताल

Fri, 28 Sep 2018 11:56 AM IST
रोहित अग्रवाल, शरद गुप्ता, अशोक सोम, अमर उजाला, मेरठ
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सरकारी स्कूलों में मिड-डे मील का खाना - फोटो : अमर उजाला
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उत्तर प्रदेश में मेरठ जिले के नगरीय क्षेत्रों के 451 सरकारी स्कूलों में करीब 66 हजार छात्रों को मिड-डे मील दिया जा रहा है। सात एनजीओ इस काम में लगे हैं। अमर उजाला की टीम ने शहर के अलावा मवाना और सरधना के स्कूलों का दौरा कर मीड-डे मील का हाल जाना, तो इस दौरान कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए। सब्जी मेरठ में बन रही थी तो रोटी नोएडा से लाई जा रही हैं। खुले ऑटो के जरिए स्कूलों में खाना ले जाया रहा था। डाइट में भी गोलमाल नजर आया। बहुत से बच्चे तो घर से खाना लाते हैं, स्कूल का भोजन करना पसंद नहीं करते हैं।

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खुले ऑटो में खाने की सप्लाई
शहर के लिसाड़ी गेट ,ब्रह्मपुरी आदि क्षेत्रों में खुले ऑटो में रखकर मिड-डे मील की सप्लाई हो रही थी। अहमदनगर के प्राइमरी स्कूल में 10:15 बजे खाना पहुंचा। स्टील के बडे़ ढके कंटेनरों में दाल भरी थी, लेकिन कंटेनर बाहर से गंदे थे। रोटियां पेपर में लिपटी हुई थीं। दाल के कंटेनर और रोटियों पर मक्खी मंडरा रही थीं। हेड टीचर के अनुसार उनके यहां हापुड़ की जनकल्याण शिक्षा विकास सेवा समिति संस्था भोजन सप्लाई करती है।

दाल में सिर्फ पानी
प्राइमरी पाठशाला नवीन बागपत गेट में एनजीओ ने दाल रोटी भेजी, लेकिन दाल में पानी ही पानी था। यही हाल जूनियर हाईस्कूल कृष्णापुरी का भी था। अहमदनगर प्राइमरी पाठशाला में जब बच्चों को थाली में दाल दी गई तो पूरी दाल थाली में ही तैर गई। बच्चों को हाथ में रोटी लेनी पड़ीं। अहमदनगर प्राइमरी स्कूल में एक थाली में तीन-तीन बच्चे खाना खा रहे थे। उनके पास चम्मच भी नहीं थी।

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मिड-डे मील का खाना - फोटो : अमर उजाला
डाइट में भी झोल, 46 ग्राम की दो रोटियां
पड़ताल में ये तथ्य भी सामने आया कि स्कूलों में एनजीओ द्वारा भेजी गई रोटियां बेहद पतली और साइज में काफी छोटी थी। बताया गया कि प्रति डायट दो रोटियां दी जाती हैं। अहमदनगर प्राइमरी स्कूल के पास ही एक दुकान पर दो रोटियों का वजन चेक किया तो रोटियां 32 से 46 ग्राम तक मिलीं। बेसिक शिक्षा विभाग के अनुसार प्राइमरी स्कूल के छात्र के लिए 100 ग्राम और उच्च प्राथमिक स्कूल के छात्र के लिए 150 ग्राम गेहूं प्रतिदिन दिया जाना जरूरी है। भोजन पकाने और स्कूलों तक पहुंचाने की जिम्मेदारी एनजीओ की होती है, उसके लिए उसे प्राइमरी छात्र के लिए प्रति डाइट पर 4.13 रुपये और उच्च प्राथमिक स्तर पर 6.18 रुपये प्रति डाइट भुगतान किया जाता है।

नहीं भाता सरकारी खाना, घर से लाते हैं
नवीन बागपत गेट प्राइमरी स्कूल की प्रधानाध्यापिका के अनुसार स्कूल में 109 छात्र हैं। गुरुवार को 75 उपस्थित थे, लेकिन इनमें से भोजन केवल 30 छात्रों ने लिया। इनके लिए रोटी केवल 50 मिलीं। अहमदनगर प्राथमिक स्कूल में भी 13 छात्रों ने खाना नहीं लिया। छात्रा सलोनी, अलिसा का कहना था कि वे घर से खाना लाते हैं। उन्हें यहां का खाना अच्छा नहीं लगता।
 
इसलिए अच्छा नहीं लगता भोजन
प्राथमिक शिक्षक संघ के नगर अध्यक्ष और कृष्णापुरी उच्च प्राथमिक विद्यालय के प्रधानाध्यापक मधुसूदन कौशिक ने बताया कि स्कूलों में एनजीओ द्वारा भेजी जा रही रोटी मशीन में बनी होती है। ये रोटियां एनजीओ वाले कहीं बाहर से लाते हैं। ऐसे में ये रोटी सुबह चार पांच बजे बन जाती होंगी। बच्चों को साढे़ 10 बजे खाना दिया जाता है, जब तक ये रोटी ठंडी भी हो जाती हैं। इसी कारण बच्चों को खाना अच्छा नहीं लगता।

सरकारी स्कूलों का हाल - फोटो : अमर उजाला
इसलिए नोएडा से लानी पड़ती हैं रोटी
एनजीओ दयावती एजुकेशनल एंड चैरिटेबिल सोसायटी दिल्ली के संचालक देवराज ने बताया कि वे दौराला क्षेत्र में एक एनजीओ के माध्यम से रोटियां लेते हैं, लेकिन फिलहाल वहां कुछ दिक्कत होने की वजह से ही नोएडा से रोटियां लानी पड़ रही हैं। एक रोटी मेकर मशीन करीब 20 लाख में लगती है, जो एक घंटे में 15 हजार रोटियां निकाल देती है। इतनी खपत उनकी नहीं है इस वजह से वे अपनी किचन में ये मशीन नहीं लगवा सके।

मवाना सुबह 9: 40 बजे, जूनियर हाईस्कूल
स्कूल के बरामदे में खाना रखा था। रोटियां टीशू पेपर में लिपटी हुईं खुले में रखी थीं। रोटियां कच्ची थीं। सब्जी में सोयाबीन और आलू कम और पानी ज्यादा था। यहां 55 छात्र हैं, 40 उपस्थित थे। फिर 10:51 बजे जब टीम यहां दोबारा पहुंची तो भी बच्चों ने खाना नहीं खाया था। पूछने पर बच्चों ने एक स्वर में कहा कि भूख नहीं है। कुछ बच्चों ने बताया कि कच्ची रोटियां हैं, खाने में अच्छी नहीं लगती हैं।

सुबह 10:45 बजे, प्राथमिक विद्यालय न. 1
टीम यहां पहुंची तो सभी बच्चे खाना खा चुके थे। एक बाल्टी में सब्जी और रोटियां पड़ी थी। स्कूल इंचार्ज नफीस अहमद ने बताया कि कुछ बच्चों को भूख नहीं थी, इसलिए खाना बच गया था।

सुबह 10:57, प्राथमिक विद्यालय न. 8
छात्र खाना खा चुके थे। खाने की गुणवत्ता पर स्कूल में तैनात एक शिक्षिका ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि पहले ही व्यवस्था बेहतर थी, कम से कम बच्चों को गर्म खाना तो मिल जाता था। अब यहां बाला जी सामाजिक विकास समिति खाना भेज रही है। सुबह लगभग नौ बजे वैन से खाना देकर चली गई। खाना ठंडा हो चुका था।

सरकारी स्कूलों का हाल - फोटो : अमर उजाला
शिक्षक भी संतुष्ट नहीं 
सरधना के किशोर कान स्थित दीवाली प्राथमिक विद्यालय की प्रधानाचार्य अलका मनोहर ने बताया कि स्कूल में 295 छात्रों में 207 उपस्थित थे। सभी को खाना मिला। उच्च प्राथमिक विद्यालय की प्रधानाचार्य मंजू ने बताया कि स्कूल में अधिकांश सही भोजन आता है, लेकिन गुरुवार को क्वालिटी हल्की थी। संत चार्ल्स इंटर कॉलेज के प्रधानाचार्य ब्रदर एन्थौनी शॉमी भी भोजन की क्वालिटी से संतुष्ट नहीं थे। 

उच्च प्राथमिक विद्यालय 
यहां बच्चों को दी गई सब्जी रोटी की क्वालिटी से छात्र और टीचर नाखुश थे। छात्रों के अलावा प्रधानाचार्य नफीस ने भी असंतुष्टि जताई। कुछ ओर स्कूलों में भी यही शिकायत शिक्षकों ने भी दबी जुबान में की। 

यहां होती है एनजीओ से सप्लाई 
मेरठ, सरधना, दौराला, रजपुरा, माछरा, खरखौदा, मवाना, हस्तिनापुर, सरधना, सरूरपुर, परीक्षितगढ़।
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नगरीय क्षेत्र में मिड-डे मील के आंकडे़  
कुल परिषदीय स्कूल   451 (कुछ इंटर कालेज भी) 
कुल छात्र               66 हजार
कुल एनजीओ          7
सालाना खर्च          8 करोड़ 

बच्चे को भरपेट भोजन देना लक्ष्य  
स्कूलों में मील सप्लाई करने वाले सभी एनजीओ की जिले में ही किचन है। समय-समय पर मिड-डे मील की जांच भी होती है। रोटी के वजन की बजाय हमारा ध्यान बच्चे को भर पेट भोजन पर है। बच्चों को भर पेट भोजन दिया जाता है, यदि कोई रोटी मांगता है तो उसे दी जाती है। बाहर से रोटी लाकर सप्लाई करने की जानकारी उनके संज्ञान में नहीं है। - सतेंद्र ढाका, बेसिक शिक्षा अधिकारी मेरठ 

अमर उजाला की टीम ने यह पड़ताल गुरुवार को की।

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