जिला पंचायत चुनाव में अधिकांश वे दावेदार मैदान में है, जो पार्टियों के कार्यकर्ता तो हैं लेकिन संगठन में किसी दायित्व पर नहीं है। ऐसे दावेदार लोकसभा और विधानसभा चुनाव में तो अपनी पार्टी के प्रति पूरी निष्ठा रखते हैं लेकिन पंचायत चुनाव में इस पर व्यक्तिगत स्वार्थ हावी हो जाता है। इसका बड़ा कारण ये भी है कि ये कार्यकर्ता कई साल से अपने अपने क्षेत्र में दावेदारी के लिए मेहनत कर रहे होते हैं। इनमें कई निवर्तमान सदस्य हैं तो कई नए हैं।
प्रत्याशी चयन में सभी दल इस समय जूझ रहे हैं। सपा और रालोद कई वार्ड में प्रत्याशी घोषित कर चुके हैं। यह आपसी गुटबाजी का ही परिणाम है कि सपा ने वार्ड 33 में दो बार प्रत्याशी बदले और फिर किसी को भी चुनाव न लड़ाने का निर्णय लिया। ऐसी स्थिति सभी दलों में है। भाजपा तीसरे चरण के लिए सूची को अंतिम रूप दे चुकी है, लेकिन बगावत के डर से 12 अप्रैल को सूची जारी करने की बात पार्टी सूत्र कह रहे हैं।
रालोद भी भाजपा की सूची के बाद अपने पूरे पत्ते खोलने की तैयारी में है। कांग्रेस ने शुक्रवार को सूची जारी करने की बात कही थी लेकिन जारी नहीं हो सकी। आजाद समाज पार्टी ने भी कुछ ही सीटों पर प्रत्याशी घोषित किए हैं। बाकी पर उसे भी भाजपा और बसपा की सूची का इंतजार है।