जामिया दारूस सलाम के मोहतमिम मौलाना यूसुफ कासमी ने बताया कि अहराम बिना सिला सफेद रंग का कपड़ा होता है, जिससे हाजी अपने बदन को ढंकते हैं। इस दौरान खुशबू लगाना, नाखून, बाल काटना और दाढ़ी बनाना मना है।
उन्होंने बताया कि दुनिया के भर के आजमीन खाना-ए-काबा की जियारत को मक्का शरीफ पहुंच चुके हैं, जहां खुदा की इबादत में मशगूल हैं, लेकिन असल इबादत इस्लामिक महीने जिलहिज की आठ तारीख से होगी, जो 12 जिलहिज तक चलेगी। इन पांच दिनों में आजमीनों के हज के सभी अरकान पूरे करने होंगे।
इस दिन ईद उल अजहा (बकरीद) होती है। फिर हाजी मक्का रवाना हो जाएंगे।
● पहला दिन, 8 जिलहिज : मक्का पहुंचकर हज का अहम अरकान तवाफ-ए-जियारत करना होता है। चांद की आठ तारीख होती है। इस दिन सभी हाजी मीना शहर में इकट्ठा होते हैं।
● दूसरा दिन, 9 जिलहिज : चांद की नौ तारीख को सभी हज मुसाफिर मीना से अराफात रवाना होते हैं। अराफात की मुजदलफा से दूरी लगभग छह किलोमीटर चलता है। यहां पहुंचकर सभी मगरिब और ईशा की नमाज अदा करेंगे, चाहे वक्त कुछ भी हुआ हो।
● तीसरा दिन, 10 जिलहिज : मीना पहुंचकर तीन शैतानों में से एक शैतान को कंकरी मारनी होगी। क्योंकि इस दिन ईद उल अजहा बकरीद होती है। फिर हाजी मक्का शहर के लिए रवाना जो जाएंगे। मक्का पहुंचकर हज का अहम अरकान तवाफ ए जियारत करना होता है।
● चौथा दिन, 11 जिलहिज: तीनों शैतानों पर कंकरी मारने का सिलसिला चलता है।
● पांचवां दिन, 12 जिलहिज : तीनों शैतानों को कंकरी मारी जाती है। कंकरी मारने के बाद हाजियों को मक्का वापस आना होता है। इस तरह पांच दिन में हेज के अहम अरकान पूरे हो जाते हैं।