कहा जाता है तभी से बडागांव का नाम भी रावण पड़ गया। मंशा देवी मंदिर में विष्णु की प्राचीन मूर्ति भी मौजूद है, जिसे इतिहासकार आठवीं शताब्दी की बताते हैं। ग्राम प्रधान दिनेश त्यागी, प्रदीप त्यागी, राजपाल त्यागी, आदि का कहना है कि भगवान राम में ग्रामीणों की पूरी आस्था है, लेकिन महाज्ञानी रावण भी ग्रामीणों के दिल में बसे हैं। मंशा देवी मंदिर परिसर में उनके नाम से रावण कुंड मौजूद है। गांव में वर्षों से रामलीला या रावण दहन नहीं होता।
लंकापति के नाम पर बड़ागांव रावण
दशानन बुराइयों का प्रतीक है। सीता हरण के बाद श्रीराम ने लंकेश को मार गिराया। लंकापति का नाम आते ही भले ही लोग घृणा करें, लेकिन बागपत जनपद के बडागांव को रावण के नाम से जाना जाता है। बड़ा गांव उर्फ रावण में दशहरा तो मनाया जाता है। लेकिन कभी रावण का पुतला नहीं जलाते। असल में हिमालय से लंका जाते वक्त रावण मंशा देवी की मूर्ति लेकर बड़ा गांव रुके थे। हालांकि देवी यहीं स्थापित हो गईं।
ग्रामीण कहते हैं कि लंकापति की वजह से ही मंशा देवी उनके गांव में स्थापित हुई। इस कारण यहां कभी उनके पुतले का दहन नहीं करने की परंपरा है। खेकड़ा के पास बसे रावण उर्फ बड़ागांव को जैन मंदिर और मंशा देवी मंदिर की वजह से भी जाना जाता है। यहां दूरदराज से श्रद्धालुओं की आवाजाही रहती है।
ग्राम प्रधान ने बताया कि रावण की वजह से उनके गांव में मंशा देवी का मंदिर बना और मूर्ति की स्थापना हो सकी। यही वजह है कि यहां कभी रावण का पुतला नहीं जलाया जाता। ग्रामीण कहते हैं कि दशहरा पूजा पाठ कर मनाते हैं, लेकिन कभी दशानन का पुतला नहीं जलाते।
रावण कुंड भी, जिसका होगा जीर्णाेद्धार
गांव के रकबे में रावण कुंड के नाम से भी तालाब है। इसका जीर्णाेद्वार कराने का प्रयास किया जा रहा है।
रावण की मूर्ति कराएंगे स्थापित
ग्रामीण कहते हैं कि रावण में लाख बुराईयां थी, लेकिन उनके नाम से गांव को पहचान मिली। वह देवी और शिव के पक्के भक्त है। गांव में रावण की मूर्ति स्थापित करने का विचार है, इस पर जल्द ही ग्रामीणों की बैठक बुलाई जाएगी।