मेरठ। हार जब होती है, जब मान ली जाती है और जीत जब होती है जब ठान लिया जाता है। यह पंक्तियां पैरालंपिक में देश के लिए दो कांस्य पदक जीतने वाली एथलीट गंगानगर निवासी प्रीति पाल पर सटीक बैठती हैं। उन्होंने कोच के सपोर्ट, अपने आत्मविश्वास और कड़ी मेहनत से मुकाम हासिल किया।
पैरा एशियन गेम्स में पदक न आने के बाद प्रीति टूट चुकी थीं, लेकिन उन्होंने अपना आत्मविश्वास कमजोर नहीं होने दिया और दिल्ली में कड़ी तैयारी की। जिसके बलबूते उन्होंने पैरालंपिक खेलों में 100 मीटर और 200 मीटर दौड़ में कांस्य पदक जीता। आज उनके पिता अनिल कुमार, माता बालेश देवी के साथ-साथ देशवासियों को उनपर गर्व है। प्रीति ने यहां तक पहुंचने के लिए कड़ा संघर्ष किया। क्या-क्या परेशानियां आईं, पदक जीता तो कैसा लगा। इन सभी सवालों के जवाब प्रीति ने मंगलवार को अमर उजाला कार्यालय पहुंचकर दिए। उनके साथ अंतरराष्ट्रीय एथलीट फातिमा खातून, उनकी बहन नेहा व भाई मौजूद रहे।
बातचीत के कुछ अंश
सवाल- ओलंपिक में पदक जीतना और पोडियम पर खड़े होने का अनुभव कैसा रहा ?
जवाब- ओलंपिक में पोडियम पर खड़ा होना हर खिलाड़ी का सपना होता है। पोडियम पर मुझे वे सब बातें याद आ गईं जो जो मेरे साथ हुआ। मुझे विश्वास नहीं हो रहा था कि मैंने पदक जीता है।
सवाल- आप एथलीट कैसे बनीं?
जवाब- मुझे दौड़ना पसंद था। सोशल मीडिया पर मैंने देखा कि कैसे दिव्यांग खिलाड़ी दौड़ में हिस्सा ले रहे हैं। इस प्रकार के इवेंट हम जैसे लोगों के लिए भी तो होंगे। क्या मैं इन खेलों में जा सकती हूं। यही सोचकर 2018 में मैं कैलाश प्रकाश स्पोर्ट्स स्टेडियम पहुंची और स्टेट चैंपियनशिप में सीधे प्रतिभाग किया और पदक जीता। इससे मेरे घरवाले भी अचंभे में पड़ गए। दादा ने तो मिठाई तक बांट दी।
सवाल- यहां तक पहुंचने में किसका हाथ रहा ?
जवाब- मुझे पैरा एथलीट फातिमा खातून ने यहां तक पहुंचाया। उन्होंने ही मुझे मेरठ से दिल्ली पहुंचाया और तैयारी कराई। दिल्ली में कोच और पैरा एथलीट सिमरन के साथ तैयारी की। वह मेरी आदर्श रहीं हैं। सिमरन के साथ भी काफी कुछ सीखने को मिला।
सवाल- ऐसा कोई पल जब लगा हो कि अब नहीं हो पाएगा ?
जवाब- दौड़ते समय साथी खिलाड़ी भी ताने देते थे कि पैरा खिलाड़ी तो आसानी से आगे बढ़ जाते हैं, उनकी बातों से मन दुखी होता था। पैरा एशियन गेम्स में चौथा नंबर आने पर तो पूरी तरह से टूट गई थी, इसके बाद खुद पर विश्वास रखा और दिल्ली तैयारी की तो राह आसान हुई।
सवाल- ट्रेनिंग में किस तरह की पाबंदिया होती हैं ?
जवाब- कोच के द्वारा एक्सरसाइज और डाइट की पूरी प्लानिंग की जाती है। मुझे छोले भटूरे और मीठा पसंद था, कोच ने सब छुड़वा दिया। यहां तक की मम्मी ने घर से मिठाई बनाकर दी थी वह भी नहीं खाई।
सवाल- कब लगा की ओलंपिक जा रही हो ?
जवाब- मुझे अभी तक विश्वास नहीं हो रहा कि मैंने ओलंपिक में पदक जीता है। वर्ल्ड चैंपियनशिप के ट्रॉयल में क्वालिफाई करने के बाद वर्ल्ड चैंपियनशिप में पदक आने के बाद सीधे ओलंपिक के लिए क्वालिफाई कर गई थी। मुझे तब भी विश्वास नहीं हुआ। जब पेरिस पहुंची तो फ्लाइट में लगा कि मैं ओलंपिक जा रही हूं।
सवाल- पेरिस पहुंचने के बाद जहन में क्या था ?
जवाब- पेरिस पहुंचते ही मेरी नींद उड़ गई। वहां ट्रैक देखकर और भीड़ देखकर डर सा लगने लगा, मुझे लगा अब कैसे होगा।
सवाल- दौड़ते समय दिमाग में क्या चल रहा था?
जवाब- दौड़ते समय मुझे सिर्फ फिनिशिंग लाइन दिख रही थी। जब आखिर के 20 मीटर रह गए तो लगा कि अब तो मेडल आ गया। मैंने कुछ नहीं देखा सिर्फ ट्रैक को देख रही थी। मेडल आते ही तिरंगा हाथ में लेकर घूमने लगी और ट्रैक को चूमा।
सवाल- खेल के अलावा क्या पसंद है, सोशल मीडिया पसंद है क्या ?
जवाब- एशियन गेम्स के बाद मैंने सोशल मीडिया पर आना बंद कर दिया। पैरा ओलंपिक में पदक आने के बाद मैंने पहली पोस्ट की, जिसके बाद अब मेरे फॉलोवर्स भी बढ़ रहे हैं, इससे खुशी मिल रही है।
सवाल- पदक आने के बाद लोगों से कैसा रिएक्शन मिल रहा है ?
जवाब- पदक आने के बाद से लोगों से अच्छा रिएक्शन मिल रहा है। जो लोग ताने देते थे वह भी फोटो खिंचाने के लिए आ रहे हैं। मुजफ्फरनगर, मेरठ सभी जगहों पर लोगों ने खूब प्यार दिया। खिलाड़ियों से भी प्यार मिल रहा है।
सवाल- प्रधानमंत्री से मिलकर कैसा लगा ?
जवाब- प्रधानमंत्री जी से मिलकर बहुत अच्छा लगा। उन्हें मैंने अपनी टी-शर्ट भी भेंट की। उन्होंने मुझसे कहा कि आपको डबल-डबल बधाई। आगे भी इसी प्रकार देश का नाम रोशन करती रही हो।
सवाल- भारतीय खिलाड़ियों का दल कैसा था, नवदीप से मिलकर कैसा लगा ?
जवाब- सभी साथी खिलाड़ी बहुत अच्छे थे। नवदीप हमेशा मजाक करते हैं। वह अच्छा माहौल बनाकर रखते हैं।
सवाल- आगे अब क्या तैयारी है ?
जवाब- अब थोड़ा रेस्ट होगा और एक-दो माह बाद से अगले साल होने वाली वर्ल्ड चैंपियनशिप की तैयारी करूंगी। एशियन गेम्स में भी इस बार पदक लाना है और 2028 के पैरालंपिक में पदक का रंग बदलना है।
अपने बच्चों को न समझें लाचार, उन्हें आगे बढ़ाएं : फातिमा
अंतरराष्ट्रीय एथलीट फामिता खातून ने कहा कि वह 2018 में प्रीति पाल से मिली थी। वह बहुत मेहनती है। शुरू से ही वह कहती थी कि कैसे मेडल लाया जा सकता है। उसकी मेहनत का ही नतीजा है कि आज उसने दो पदक जीते हैं। मैंने तो सिर्फ उसे राह दिखाई है। फातिमा ने दिव्यांग बच्चों के माता-पिता से भी अपील की है कि वह अपने बच्चों को लाचार न समझें। उन्हें उनकी जिम्मेदारी समझाएं और आगे बढ़ाएं। आज प्रीति ऐसे खिलाड़ियों के लिए आदर्श बन गई हैं।