डॉ. बीपी कौशिक
- फोटो : अमर उजाला
जिला अस्पताल ईएनटी डॉ. बीपी कौशिक ने बताया कि मानक से ज्यादा ध्वनि प्रदूषण तो सीधे कानों को प्रभावित करता है, वहीं वायु प्रदूषण से साइनोसाइटिस, जुकाम और एलर्जी होती है, जो बाद में कानों को बहुत ज्यादा प्रभावित करती है। जैसे-टिनिटस बीमारी जुकाम के बाद प्रभावित करती है। उन्होंने बताया कि जुकाम में मरीजों की नाक बहती है। नाक से कान के बीच स्थित यूस्टेकियन ट्यूब में नाक से पानी चला जाता है। इस पानी के कारण मध्य कान में संक्रमण हो जाता है। कई बार कफ के कारण ट्यूब ब्लॉक हो जाता है। इससे कान का संक्रमण होने के साथ ही सुनने की क्षमता भी मरीज की कम हो जाती है।
ध्वनि और वायु प्रदूषण निकला सबसे बड़ा कारण
जिला अस्पताल के ईएनटी डॉ. गौरव ने बताया कि हर माह करीब दो से ढाई हजार मरीज आ रहे हैं। सालभर में इनकी संख्या 25 हजार से ज्यादा पहुंच गई। ऑडियो मीटर के जरिए मरीजों की सुनने की क्षमता मापी जाती है, जिसमें पता चला कि बड़ी संख्या में युवा प्रदूषण (वायु-ध्वनि) के कारण कानों की बीमारियों और सुनने की क्षमता कम होने के शिकार हो रहे हैं।
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- कानों में संक्रमण के चलते दर्द का उभरना सबसे पहला लक्षण होता है।
- कान में भारीपन महसूस होना।
- मवाद होना, बुखार, कानों का बहना।
- सोने में परेशानी आना, सिरदर्द, भूख न लगना।
- कानों में घंटी की आवाज सुनाई देना।
- चक्कर आना, उल्टी होना, सुनने की क्षमता का कमजोर होना।
यह हैं सुनने की क्षमता के मानक
- 15 से 20 डेसीबेल तक की आवाज से कान को कोई नुकसान नहीं होता है
- 60 से 65 डेसीबेल के बाद कान को आवाज चुभने लगती है
- 115 डेसीबेल की आवाज से कान का पर्दा फट सकता है
- 85 से 120 डेसीबेल आवाज पटाखे की होती है
- 85 से 115 डेसीबेल आवाज हेडफोन का होता है
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