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डॉक्टर हैं तो विभाग नहीं, विभाग हैं तो डॉक्टर नहीं

Thu, 09 Jun 2016 01:58 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
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फाइल फोटो - फोटो : अमर उजाला
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 मेडिकल कॉलेज में इलाज के नाम पर मरीजों को ‘सुपर’ धोखा दिया जा रहा है। डॉक्टर हैं तो विभाग नहीं और विभाग हैं तो डॉक्टर नहीं हैं। स्वास्थ्य विभाग ने सुपर स्पेशियलिटी सुविधाओं के लिए करोड़ों रुपये की मशीनें मुहैया कराई हैं, लेकिन चिकित्सक न होने के कारण वे धूल फांक रही हैं।
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प्रमुख विभागों की हालत खस्ता है। प्लॉस्टिक सर्जरी का विभाग तो पूरी तरह से बंद हो गया है। कार्डियोलॉजी, न्यूरो सर्जरी में नाम का उपचार चल रहा है। करोड़ों रुपये का सेटअप बेकार पड़ा है और मरीज प्राइवेट अस्पतालों में लुटने को मजबूर हैं।
मेडिकल कॉलेज परिसर में 150 करोड़ की लागत से सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल बनाया जा रहा है। विभाग की मंशा है कि दो साल में मरीज को एक छत के नीचे सभी सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं। लेकिन इसमें संशय है। क्योंकि विभागों का हाल सबके सामने है।
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जब से वरिष्ठ कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. जीके एनेजा को एजी स्वास्थ्य चिकित्सा शिक्षा का एडी बनाया है, तब से कार्डियोलॉजी विभाग में उपचार बंद है। न मरीजों की इको हो रही है और न ही पीएफटी, जबकि सबसे महंगा सेटअप कार्डियोलॉजी विभाग के पास है।
करीब साढ़े तीन साल तक विभाग में केवल खानापूर्ति के लिए शनिवार को उपचार की सुविधा थी, लेकिन 10 महीने से वह भी बंद हो गई है। अब मेडिसन विभाग के डॉ. अरविंद को कार्डियोलॉजी का चार्ज दिया गया है, लेकिन उसके बाद भी मरीजों को इलाज नहीं मिल पा रहा है।
उधर, प्लॉस्टिक सर्जरी से डॉ. फैजल करीब एक साल पहले इस्तीफा दे चुके हैं। प्लॉस्टिक सर्जरी का पूरा साजो सामान अब धूल फांक रहा है। न्यूरो सर्जरी में डॉ. प्रदीप भारती गुप्ता के जाने के बाद से लंबे समय तक कोई चिकित्सक नहीं आया था। अब डॉ. संजय शर्मा न्यूरो सर्जरी में भेजा गया है, लेकिन रिजल्ट यहां भी शून्य ही है। ऐसे में स्पेशियलिटी के नाम पर सिर्फ मशीन व उपकरण खरीदने तक ही कॉलेज सीमित रहा गया। मरीज को बेहतर इलाज मुहैया कराने का दावा हवा में उड़ गया है।
 
करोड़ों को सेटअप
कार्डियोलॉजी विभाग को साल 2009 में बनाया गया। उस वक्त 99,72,560 रुपये की ईको और करीब सवा करोड़ रुपये (1,25,30000) की टीएफटी, टीएमटी मशीनें खरीदी गईं। विभाग को खड़ा करने में करीब साढ़े तीन करोड़ रुपया का खर्च आया। अगर आप मेडिकल कालेज का कार्डियोलॉजी विभाग देखेंगे तो मशीनों को देखकर दंग रह जाएंगे। ऐसी मशीनें शायद ही किसी निजी संस्थान में आपको मिलें, लेकिन ऐसे सिस्टम का क्या फायदा जहां पर मरीजों को इलाज ही न मिल पा रहा हो।

न्यूरो सर्जरी
मेडिकल कॉलेज में न्यूरो सर्जरी के लिए करीब 80 लाख रुपये का सामान 10 सालों में खरीदा गया है, लेकिन उसके बाद भी मरीजों को सर्जरी कराने के लिए निजी अस्पतालों में जाना पड़ता है। आज की स्थिति में गिने चुने मरीजों की ही सर्जरी हो रही है। डॉ. प्रदीप भारती के जाने बाद सर्जरी की संख्या और भी समिति हो गई है।

प्लॉस्टिक सर्जरी
मेडिकल कॉलेज में प्लॉस्टिक सर्जरी से जुड़े तमाम उपकरण हैं। करीब 30 लाख से ऊपर का सामान विभाग ने खरीदा है। डॉ. फैजल के कार्यकाल में कुछ सर्जरी हुईं भी, लेकिन कभी विभाग सक्रिय रूप से काम करता दिखाई नहीं दिया। अब विभाग पर पूरी तरह से ताला लगा है।
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