पहले सिर्फ राष्ट्रीय पार्टियां या बड़े पद के उम्मीदवार ही पीआर एजेंसियों और चुनावी रणनीतिकारों को काम पर रखते थे लेकिन आज बाजार का स्वरूप पूरी तरह बदल चुका है। मेरठ में हर विधानसभा क्षेत्र में एक समर्पित वॉर रूम है जहां ग्राफिक्स डिजाइनर, वीडियो एडिटर और कंटेंट राइटर्स 24 घंटे काम कर रहे हैं। अब स्थानीय स्तर के चुनावों में भी डिजिटल मार्केटिंग का क्रेज सिर चढ़कर बोल रहा है।
गांव के प्रधान पद के उम्मीदवार भी अपनी रील बनवाने, व्हाट्सएप ग्रुप्स को मैनेज करने और सोशल मीडिया पर विज्ञापन चलाने के लिए स्थानीय डिजिटल एजेंसियों को लाखों रुपये का ठेका दे रहे हैं। राजनीतिज्ञों का मानना है कि आज के समय में भारी-भरकम भाषणों से ज्यादा असर रील या मजेदार मीम डालते हैं।
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जनता की नब्ज पर पकड़
डिजिटल युग में चुनावी रणनीतियों को पूरी तरह बदल दिया गया है। अब मतदाताओं को लुभाने के लिए केवल नारों का सहारा नहीं लिया जाता बल्कि डेटा माइनिंग के जरिए उनके व्यवहार को समझा जाता है।
तकनीकी टीमें हर बूथ, हर मोहल्ले और यहां तक कि व्यक्तिगत स्तर पर मतदाताओं की पसंद, जाति, उम्र और आर्थिक स्थिति का डेटा जुटाती हैं। मेरठ में इस तरह की कई कंपनियां भी हैं जो दावा करती हैं कि डेटा, रणनीति, कंटेंट और रचनात्मकता के दम पर वह नेता की छवि को मजबूत करते हैं और उनकी चुनावी जीत की राह आसान बनाते हैं। ये कंपनियां शहर से लेकर गांव तक अपनी पैठ जमा रही हैं।