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Meerut News: हर माह 14.25 करोड़ करते गर्क, फिर भी महानगर बना दिया नर्क

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- कागजों में चलती रही फाइल, भुगतान भी हुआ और सफाई नहीं हुई
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- स्वच्छ भारत मिशन यूनिट पर प्रतिमाह 50 लाख खर्च करता निगम
फोटो
माई सिटी रिपोर्टर
मेरठ। स्वच्छ सर्वे में मेरठ की 17 वीं रैंक मिलने के जिम्मेदार नगर निगम के अधिकारी हैं। सफाई के नाम पर प्रतिमाह 14.25 करोड़ रुपये खर्च करने वाले निगम ने महानगर को नर्क बना दिया। स्वच्छता की फाइल कागजों में चलाकर भुगतान भी लगातार होता रहा है, लेकिन सफाई नहीं हुई। कबाड़ से जुगाड़, सड़क किनारे छोटे-छोटे पार्क, मुख्य चौराहों और तालाबों की सफाई के बाद सौंदर्यकरण सहित कई कार्य की जिम्मेदारी संभालने वाला स्वच्छ भारत मिशन(एसबीएम) यूनिट भी फेल साबित हो गया। उक्त यूनिट का प्रतिमाह 50 लाख रुपया निगम उठाता है, इसके बावजूद मेरठ टॉप-5 की सूची में शामिल नहीं हो सका।
प्रदेश में 17 नगर निगम हैं। साफ-सफाई के मामले में मुरादाबाद और शाहजहांपुर के बाद मेरठ नगर निगम सबसे निचले पायदान पर पहुंच गया। करीब बीस लाख की आबादी वाले मेरठ शहर पर नगर निगम सफाई के मामले में प्रतिमाह 14.25 करोड़ रुपया खर्च करता है। इसमें 2415 अस्थायी स्वच्छता मित्र हैं, जिनको प्रतिमाह 3.74 करोड़ का भुगतान होता है। दिल्ली रोड, कंकरखेड़ा और सूरजकुंड वाहन डिपो बनाए हैं, जहां से साफ-सफाई से लेकर डाेर-टू-डोर कूड़ा उठाने का कार्य चलता है। डोर-टू-डोर कूड़ा उठाने वाली बीवीजी कंपनी के साथ निगम का पांच साल का अनुबंध है। निगम 211 वाहन और 32 ई-रिक्शा हस्तांतरित करने के साथ-साथ प्रतिमाह उक्त कंपनी को दो करोड़ का भुगतान करता है। वाहनों की मरम्मत में एक करोड़ खर्च, दो करोड़ का पेट्रोल-डीजल और अन्य संसाधनों पर निगम अलग से पैसा खर्च करता है। कूड़ा निस्तारण प्लांट के नाम पर दो-तीन करोड़ प्रतिमाह निगम खर्च कर रहा है। 2.50 करोड़ कीमत की सुपर सकर मशीन, रोड स्वीपिंग मशीन, रिफ्यूज कांपेक्टर, एंटी स्मॉग गन और रोबोट सहित कई संसाधन भी नगर निगम ने खरीदे है। ताकि शहर की सफाई व्यवस्था बेहतर हो। इसके बावजूद भी स्वच्छ सर्वेक्षण की रैंकिंग में मेरठ फिसड्डी आया। उक्त रिपोर्ट के आधार पर शहर की सफाई बिलकुल नहीं हुई है। कूड़े के पहाड़ होने के चलते बीमारियों फैल रही है।
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एसबीएम का रिजल्ट खराब
महानगर की सफाई व्यवस्था बेहतर करने की एसबीएम की सबसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। प्रोजेक्ट मैनेजर के साथ 10-15 कर्मचारियों का भुगतान निगम सिर्फ इसी बात पर देता है कि वह शहर को गंदा होने से बचाए। कूड़े के ढेर हटवाकर वहां पर सौंदर्यकरण के साथ मुख्य चौराहों पर कबाड़ से जुगाड़ वाला फार्मूला इस्तेमाल करें। कम खर्च में बेहतर सौंदर्यकरण और स्वच्छता से जुड़े सभी कार्यों की देखरेख एसबीएम करता है। ताकि स्वच्छ सर्वे में अपने शहर रैंकिंग अच्छी रही। देश में 108 और प्रदेश में 17 वीं रैंक मेरठ को मिलने पर एसबीएम की कार्यशैली की भी पोल खोली है।
24 घंटे बाद भी असर नहीं
स्वच्छता में खराब स्थिति आने के 24 घंटे बाद भी निगम के अधिकारियों पर कोई असर नहीं है। शुक्रवार को स्वच्छ सर्वे की रैंक को लेकर निगम की अधिकारियों के बीच कोई मंथन नहीं हुआ। शहर की स्थिति कैसे सुधरेंगी, इसको लेकर अधिकारी गंभीर नहीं है। शहर में सफाई व्यवस्था सुधरने पर कार्य करेंगे, यह रटारटाया बयान देकर अधिकारी अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ रहे हैं। 22 जनवरी तक अयोध्या में रामलला के प्राण प्रतिष्ठा समारोह में मेरठ शहर में साफ-सफाई बेहतर हो जाए, इसकी तैयारी में निगम के अधिकारी लगे है।
कूड़ा हटाने में फेल निगम
ट्रांसफर स्टेशन, एमआरएफ सेंटर, कूड़ा निस्तारण प्लांट या फिर गली-मोहल्ले से कूड़ा उठाने की व्यवस्था हो, इन सभी मामलों में नगर निगम फेल साबित हो गया। 500 करोड़ से ज्यादा लागत के वाहन निगम ने खरीद रखे है, लेकिन गली-मोहल्ले से कूड़ा उठाने में वह नाकाम है। गांवड़ी, मंगतपुरम और लोहियानगर में कूड़े के पहाड़ लगे है। पुराना कचरा कई सालों से पड़ा हुआ है। जिससे भूगर्भ भी दूषित हो रहा है और लोग बीमार पड़ रहे है। जिसको लेकर एनजीटी ने भी कई बार नाराजगी जताई, लेकिन निगम पर असर नहीं पहुंचा।
मंगतपुरम की फाइल ढूंढी
जुलाई 2023 में स्वच्छ भारत मिशन के तहत 9.20 करोड रुपये मंगतपुरम का कूड़ा हटाने के लिए नगर निगम को मिला था। छह महीने बीतने के बावजूद भी निगम ने टेंडर की प्रक्रिया पूरी नहीं की। एक अधिकारी कमीशन के चक्कर में दो महीने तक फाइल को दबाकर बैठे रहे। जिसको लेकर काफी किरकिरी हुई थी। रि-टेंडर भी सफल नहीं हुआ। अब स्वच्छ सर्वे की रैंक आने पर दोबारा से निगम में मंगतपुरम की फाइल ढूंढी जा रही है।


क्या कहते निगम के पार्षद
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सालों से सफाई व्यवस्था खराब थी। अब मैं खुद स्वच्छता मित्रों के साथ खड़े होकर कूड़ा उठवाता हूं, जिसका असर मेरे वार्ड में देखने काे मिल रहा है। सभी पार्षदों को अपने-अपने वार्ड में स्वच्छता मित्रों के साथ खड़े होकर कार्य कराना चाहिए। कूड़ा निस्तारण प्लांट चालू हो, इसके लिए महापौर और नगर आयुक्त से मुलाकात करेंगे। स्वच्छ सर्वे में मेरठ की रैंक प्रथम आए, इसको लेकर निगम के अधिकारियों को गंभीर होना पड़ेगा।
उत्तम सैनी, पार्षद वार्ड-44
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डोर-टू-डोर कूड़ा उठाने वाली कंपनी भी शहर में भेदभाव करती है। लिसाड़ीगेट, ब्रह्मपुरी सहित कई जगहों पर कूड़े के ढेर लगे रहते हैं। पार्षद पति होने के नाते मैं खुद स्वच्छता मित्रों के संपर्क में रहता हूं। वार्ड की सफाई के साथ निगम के अधिकारियों को शहर में सौंदर्यकरण पर ध्यान देना चाहिए।
शाहिद अब्बासी, पार्षद पति वार्ड-89
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साफ-सफाई के साथ सौंदर्यकरण के बारे में भी अधिकारियों को गंभीर होना पड़ेगा। स्वच्छ सर्वे में मेरठ की 17 वीं रैंक के जिम्मेदार निगम के अधिकारी है। प्रभारी नगर स्वास्थ्य अधिकारी को कई कार्यो की जिम्मेदारी दी हुई है, जिसके चलते शहर में सफाई नहीं हो रही है।
फजल करीम, पार्षद वार्ड-71
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स्वच्छ सर्वे में निगम की स्थिति बहुत खराब आई है। राजनीति से ऊपर उठकर सफाई व्यवस्था में बदलाव लाने की जरूरत है। करोड़ों रुपये निगम साफ-सफाई पर खर्च करता है और रैंक सबसे खराब आती है। कार्यकारणी के सदस्यों के साथ बैठक कार्ययोजना बनानी होगी।
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पवन चौधरी, पार्षद वार्ड-29
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नगर निगम की पहली बोर्ड बैठक में ही कूड़ा निस्तारण प्लांट लगाने का प्रस्ताव रखा था। वैज्ञानिक पद्धति से कूड़ा प्लांट सुचारू रूप से चल जाए तो शहर की स्थिति में सुधार हो जाएगा। सफाई और जलभराव की समस्या को लेकर अधिकारियों को गंभीर होना पड़ेगा, तभी बदलाव होगा।
पूनम गुप्ता, पार्षद वार्ड-35
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