- दशमेशनगर में कथा के अंतिम दिन लंका विजय तक के प्रसंग सुनाए
माई सिटी रिपोर्टर
मेरठ। दशमेश नगर में आयोजित श्रीराम कथा के अंतिम दिन कथा व्यास जनार्दन तिवारी ने भगवान श्रीराम और सुग्रीव की मित्रता, माता सीता की खोज और लंका विजय तक के प्रसंगों का भावपूर्ण वर्णन किया। उन्होंने कहा कि भक्ति ही भक्त और भगवान को जोड़ने का सशक्त माध्यम है। जब भक्त सच्चे मन से प्रभु का स्मरण करता है तो भगवान स्वयं उसकी सहायता के लिए आते हैं।
कथा में माता सीता की खोज के लिए वानर सेना के चारों दिशाओं में प्रस्थान करने का प्रसंग सुनाया गया। जामवंत के प्रेरित करने पर हनुमान जी ने अपनी शक्ति का स्मरण किया और समुद्र लांघकर लंका पहुंचे। वहां उन्होंने लंका का अवलोकन किया तथा विभीषण से भेंट कर माता सीता के अशोक वाटिका में होने की जानकारी प्राप्त की।
अशोक वाटिका में हनुमान ने माता सीता को प्रभु श्रीराम का संदेश सुनाया। इसके बाद मेघनाथ द्वारा हनुमान जी को बंदी बनाकर रावण की सभा में प्रस्तुत करने, उनकी पूंछ में आग लगाने का प्रसंग सुनाया गया। प्रभु श्रीराम ने समुद्र तट पर पहुंचकर रामेश्वर में भगवान शिव की स्थापना की और समुद्र से मार्ग देने की प्रार्थना की। इसके बाद नल नील के नेतृत्व में समुद्र पर सेतु निर्माण हुआ। इसमें प्रभु के नाम से पत्थर भी तैरने लगे।
कथा में श्रीराम और रावण के मध्य हुए भीषण युद्ध तथा रावण वध का प्रसंग भी सुनाया गया। रावण के वध के बाद विभीषण का राज्याभिषेक हुआ और भगवान श्रीराम अयोध्या लौटे, जहां उनके स्वागत में संपूर्ण नगर हर्षोल्लास से भर गया। कथा व्यास जनार्दन तिवारी ने कहा कि जो लोग भगवान से जुड़े रहते हैं। उनके जीवन में चाहे कितनी भी विपत्तियां आएं, प्रभु स्वयं उन्हें संकटों से मुक्ति दिलाते हैं। मीडिया प्रभारी सचिन कुमार गुप्ता ने बताया कि कथा में बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे।