सहारनपुर में फतवा से संबंधित उत्तराखंड हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए जमीयत उलमा-ए-हिंद ने सुप्रीम कोर्ट में प्रार्थना पत्र देकर इस पर स्टे की मांग की है। साथ ही इसमें यह भी कहा गया है कि उत्तराखंड हाईकोर्ट का निर्णय संविधान की धारा 141 के विपरीत है। जिसके तहत किसी भी अदालत को सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ फैसला देने का हक नहीं दिया गया है।
जमीयत उलमा-ए-हिंद के राष्ट्रीय अध्यक्ष मौलाना महमूद मदनी ने सुप्रीम कोर्ट में दिए प्रार्थना पत्र में कहा कि उत्तराखंड हाईकोर्ट का यह फैसला भारतीय संविधान की धारा 26 और विश्वलोचन मदान केस बनाम भारत सरकार में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के विपरीत है। भारतीय संविधान की धारा 26 (बी) में सभी को अपनी धार्मिक समस्याओं में स्वयं के प्रबंध का अधिकार दिया गया है इसलिए इसे कोई भी अदालत खत्म नहीं कर सकती। जमीयत उलमा-ए-हिंद ने उच्चतम न्यायालय में इस बात की भी शिकायत की है कि हाईकोर्ट ने लक्सर पंचायत के फरमान को फतवा समझने की गलती की है और इस सिलसिले में सिर्फ एक समाचार पत्र को आधार बनाकर फैसला दे दिया। हालांकि अखबार के अध्ययन से यह प्रतीत होता है कि वह सिर्फ पंचायती फरमान है और इसका फतवे से दूर-दूर तक संबंध नहीं है।