फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

कैंसर से पीड़ित प्रख्यात उपन्यासकार वेदप्रकाश शर्मा का निधन

Sun, 19 Feb 2017 09:32 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो/ मेरठ
विज्ञापन
फाइल फोटो - फोटो : अमर उजाला
विज्ञापन
वर्दी वाला गुंडा जैसे चर्चित उपन्यासों के जरिये पाठकों के दिलों पर राज करने वाले प्रख्यात उपन्यासकार वेदप्रकाश शर्मा चिरनिद्रा में लीन हो गए हैं। शुक्रवार रात करीब 11:50 बजे अपने शास्त्रीनगर स्थित आवास पर उन्होंने अंतिम सांस ली। उनके निधन से शहर में शोक की लहर है। वह एक साल से अधिक समय से बीमार थे। मुंबई से उनका इलाज चल रहा था।
विज्ञापन


वेदप्रकाश शर्मा का जन्म 6 जून 1955 को हुआ था। उन्हें किशोरावस्था से ही पुस्तकें पढ़ने और लिखने का शौक था। युवावस्था की दहलीज पर कदम रखते ही उन्होंने उपन्यास लेखन शुरू कर दिया था। कुछ ही दिन में वह पाठकों के पसंदीदा लेखक हो गए थे। उन्होेंने 250 से अधिक उपन्यास लिखे। उनके लिखे उपन्यास बेहद प्रेरणादायक और उद्देश्य परक होते थे। वर्ष-1993 में उनके उपन्यास वर्दी वाला गुंडा ने उन्हें देशभर में काफी शोहरत दिलाई थी, जिसकी आठ करोड़ से ज्यादा प्रतियां बिक चुकी हैं। बॉलीवुड में भी उनके लेखन के जलवे थे।

कई फिल्मों की उन्होंने पटकथा लिखी। फिल्म ‘सबसे बड़ा खिलाड़ी’ उनके उपन्यास लल्लू पर आधारित थी। इसके अलावा ‘इंटरनेशनल खिलाड़ी’ फिल्म की पटकथा भी उन्होंने ही लिखी थी। उनके उपन्यास छोटे पर्दे पर सीरियल के रूप में भी सामने आए। देश भर में उनके प्रशंसक हैं। उनके परिवार में पत्नी मधु शर्मा के अलावा बेटा शगुन और तीन बेटियां हैं। देर रात 61 वर्षीय वेदप्रकाश शर्मा के निधन की खबर शहर में फैली तो लोग अंतिम दर्शन को उनके निवास पर पहुंचने लगे। शहर के राजनीतिक, सामाजिक, व्यापारी, उद्यमी और गण्यमान्य लोगों ने उनके निधन पर दुख प्रकट किया है। 
विज्ञापन


बेगमपुल पर मिला था ‘वर्दी वाला गुंडा’  
- खाकी और खादी के बीच खूब चर्चित रहे
मेरठ। लेखनी और साहित्य के सिकंदर वेदप्रकाश शर्मा का लेखन हमेशा याद किया जाएगा। राजनीतिक के अलावा पुलिस और प्रशासनिक अफसरों में उनके नाम की खूब चर्चा होती थी। आम आदमी की भाषा में लिखने वाले वेद प्रकाश शर्मा देश के बड़े लेखक में शुमार हुए। उनसे जुड़े लोगों के मुताबिक, एक बार वह बेगमपुल पर घूम रहे थे। तभी वर्दी में एक दरोगा पहुंचते हैं। वह कुछ लोगों पर ऐसे डंडे बरसाते हैं, जैसे बदमाशों को पीट रहे हों। वेद प्रकाश शर्मा वर्दी वाले उस दरोगा को देखते हैं। बाद में उनके मन में जो विचार पनपा, उसी ने उन्हें बड़े मुकाम तक पहुंचा दिया। वर्दी वाला गुंडा उपन्यास में उनके द्वारा लिखी गई घटना को पढ़कर आज भी पुलिस अफसर सीख लेते हैं। 

आवास में रखे हैं उपन्यास
शास्त्रीनगर स्थित कोठी के पास उन्होंने फैैंसी लाइट का शोरूम बनवाया था। उसे उनका बेटा शगुन चलता है। शोरूम के बेसमेंट में उनकी किताबें की लाइब्रेरी है। वहीं पर सभी उपन्यास सहेजकर रखे हैं। बताते हैं जब वह लिखते और पढ़ते थे तो परिवार का कोई सदस्य उनके पास नहीं जाता था। 
आइए... आइए कैसे हैं आप
वेदप्रकाश शर्मा का व्यवहार मधुर था। वह बच्चों से लेकर बड़ों तक को इज्जत देते थे। एक बार उनके शोरूम में आग लग गई थी। जब उनसे बात की गई तो उन्होंने बड़ी मधुरता से बात की। साथ ही घर बुलाया और बाहर तक छोड़ने भी आए।

घर पर पहुंचे लोग
वेदप्रकाश शर्मा ने समाज को बहुत करीब से देखा था। पहले उनका परिवार कोतवाली क्षेत्र के स्वामीपाड़ा में रहता था, लेकिन अब शास्त्रीनगर के ब्लॉक में पीवीएस रोड पर रह रहा है। उनका बेटा शगुन है। तीन बेटियों में करिश्मा, गरिमा और खुशबू हैं। सभी की शादी हो चुकी है। उनकी मौत का पता चलते ही शास्त्रीनगर और शहर के आसपास के लोग भी घर पहुंच गए।

मूवी टिकट की तरह होती थी नॉवेल की बुकिंग
मेरठ। वेद प्रकाश शर्मा नहीं रहे, लेकिन उनका लेखन हमेशा पाठकों के जेहन में रहेगा। अपनी कृतियों से वह अजर और अमर रहेंगे। वेद प्रकाश शर्मा के उपन्यासों का पाठकों को लंबा इंतजार रहता था। मूवी टिकट की तरह ही शहर के कई बुक स्टॉल पर उनके उपन्यासों की एडवांस बुकिंग होती थी। वर्ष-1993 में प्रकाशित उपन्यास वर्दी वाला गुंडा की पहले ही दिन देशभर में 15 लाख प्रतियां बिक गई थीं। शहर के सभी बुक स्टॉल पर कुछ ही घंटों में उपन्यास की प्रतियां समाप्त हो चुकी थीं। बुकिंग कराने वाले कई लोगों को उपन्यास नहीं मिलने से निराशा हाथ लगी थी।

वेदप्रकाश शर्मा को बचपन से ही उपन्यास पढ़ने का शौक था। उनके इसी शौक ने उन्हें देश भर में पहचान दिलाई। बात 1972 की है। हाईस्कूल की परीक्षा देकर वह गर्मी की छुट्टियों में अपने पैतृक गांव बिहरा (बुलंदशहर) गए थे। उपन्यास के शौकीन वेदप्रकाश अपने साथ दर्जन भर से अधिक किताबें ले गए थे। कुछ ही दिन में उन्होंने सारी किताबें पढ़ डालीं। समय व्यतीत करने के लिए उन्होंने उपन्यास लिखना शुरू कर दिया। पिता को यह बात पता चली, तो उन्हें काफी डांट पड़ी।

बाद में पिता ने पढ़ा तो उनके दिल को बेटे की लेखन शैली छू गई। उनका निधन होने पर शास्त्रीनगर स्थित आवास पर पहुंचे लोग प्रारंभिक जीवन में उनके संघर्ष की चर्चा करते भी नजर आए। लोगों ने बताया कि वेद प्रकाश जब युवा थे, उसी दौरान उनके पिता को गैंगरीन हो गया था। उनके बडे़ भाई की मौत हो चुकी थी। ऐसे में वेद प्रकाश ने ही परिवार को संभाला।

शुरुआती दौर में नहीं मिला नाम
वेद प्रकाश का लेखन जीवन भी संघर्षों से भरा रहा। उनके लिखे प्रारंभिक उपन्यास बिना उनके नाम के प्रकाशित हुए। इससे उन्हें पहचान नहीं मिल पाई। मेहनताना भी नाम मात्र का ही मिलता था। लेकिन, वेदप्रकाश पीछे नहीं हटे और उनकी लग्न एक दिन रंग लाई। पहली बार उपन्यास आग के बेटे (1973) के मुख पृष्ठ पर वेद प्रकाश शर्मा का पूरा नाम छापा, लेकिन फोटो नहीं। बाद में उसी साल ज्योति प्रकाशन और माधुरी प्रकाशन दोनों ने उनके नाम के साथ फोटो भी छापना शुरू कर दिया।

धीरे-धीरे उनके उपन्यास 50,000 और फिर एक लाख छपने लगे। उनके सौवें नॉवेल कैदी नं. 100 की ढाई लाख प्रतियां बिकी थीं। उन्होंने 1985 में खुद तुलसी पॉकेट बुक्स के नाम से प्रकाशन शुरू किया। उनके 70 से ज्यादा उपन्यास इसी प्रकाशन ने छापे हैं। सबसे ज्यादा लोकप्रियता वर्ष-1993 में वेदप्रकाश को वर्दी वाला गुंडा से मिली। इस उपन्यास की अब तक लगभग 8 करोड़ प्रतियां बिक चुकी हैं। 

सामाजिक समस्याएं उठाईं
1985 में उन्होंने दहेज की समस्या को अपने उपन्यास बहू मांगे इंसाफ से उठाया था। बाद में इसी उपन्यास पर शशिलाल नायर के निर्देशन में बहू की आवाज फिल्म बनी। इसके अलावा दहेज में रिवाल्वर, विधवा का पति नामक उपन्यास से भी उन्होंने सामाजिक समस्याएं उठाईं। 

चर्चित उपन्यास
वेद प्रकाश शर्मा ने वर्दी वाला गुंडा, केशव पंडित, बहू मांगे इंसाफ, दहेज में रिवाल्वर, तीन तिलंगे, डायन, भस्मासुर, सुपरस्टार, पैंतरा, सारे जहां से ऊंचा, रैना कहे पुकार के, मदारी, क्योंकि वो बीवियां बदलते हैं, कुबड़ा, चक्रव्यूह, शेर का बच्चा, सबसे बड़ा जासूस, रणभूमि, लाश कहां छुपाऊं, कफन तेरे बेटे का, देश न जल जाए, सीआईए का आतंक, हिंद का बेटा, कर्फ्यू, बदसूरत, चकमा, गैंडा, अपराधी विकास, सिंगही और मर्डर लैंड, मंगल सम्राट विकास समेत 250 से अधिक उपन्यास लिखे हैं।

फिल्में और धारावाहिक
तीन नवंबर वर्ष-1993 को रिलीज हुई फिल्म अनाम की पटकथा वेद प्रकाश शर्मा ने लिखी थी। इसका निर्देशन रमेश मोदी ने किया था। इसके बाद 9 जून वर्ष-1995 को रिलीज हुई फिल्म सबसे बड़ा खिलाड़ी उनके उपन्यास लल्लू पर आधारित थी। इसका निर्देशन उमेश मेहरा ने किया था। इसकी अगली सिरीज इंटरनेशनल खिलाड़ी की भी कहानी वेद प्रकाश शर्मा ने लिखी थी, जो 26 मार्च 1999 को रिलीज हुई थी। इसके अलावा उनके प्रसिद्ध उपन्यास केशव पंडित पर वर्ष-2010 में टीवी सीरियल भी बना। यह भी दर्शकों में खूब चर्चित हुआ।

मिले कई सम्मान
वेद प्रकाश शर्मा को वर्ष-1992 व 1994 में मेरठ रत्न अवार्ड,  वर्ष-1995 में नटराज अवार्ड और वर्ष-2008 में नटराज भूषण अवार्ड नवाजा गया था। इसके अलावा भी उन्हें अपने रचनाकर्म के लिए कई सम्मान मिले।
विज्ञापन


परिवार
पत्नी : मधु शर्मा
पुत्र : शगुन शर्मा (बालाजी लाइट्स शोरूम के संचालक)
बेटियां : करिश्मा, गरिमा और खुशबू 
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें