- कम समय में तैयार होने वाली फसल मूंग, लाभ के साथ जोखिम से चिंतित हैं किसान
रविंद्र चौहान
हस्तिनापुर। सहफसली खेती के तौर पर मूंग की खेती किसानों की आमदनी को बढ़ा सकती है। इसकी बुवाई से किसान को आर्थिक लाभ होने के साथ-साथ भूमि की उर्वरा शक्ति में भी सुधार होगा। क्षेत्र में इन दिनों मूंग की खेती किसानों के बीच चर्चा का विषय बनी हुई है। कुछ किसान इसे कम समय में ज्यादा फायदा देने वाली फसल बता रहे हैं, जबकि कुछ किसान इसे जोखिम भरी खेती मानते हैं।
किसानों का कहना है कि मूंग की फसल करीब 60–70 दिन में तैयार हो जाती है और यह जमीन की उर्वरता भी बढ़ाती है। दलहनी फसल होने के कारण मूंग खेत में नाइट्रोजन की मात्रा बढ़ाने में मदद करती है। कई किसान गन्ने के साथ सहफसली खेती के रूप में मूंग को उपयोगी मानते हैं। इसके अलावा गेहूं की कटाई के बाद खाली पड़े खेत का भी सही उपयोग हो जाता है। किसान सरदार सुंदर सिंह का कहना है कि मूंग की खेती में जोखिम भी कम नहीं है। अगर ज्यादा बारिश हो जाए तो फसल गलने का खतरा रहता है। वहीं इल्ली, थ्रिप्स और सफेद मक्खी जैसे कीट भी फसल को नुकसान पहुंचाते हैं। किसान पंकज चौधरी ने बताया कि मूंग की फसल के बाद किसानों को बाजार में उचित मूल्य न मिलने की शिकायत भी रहती है।
मार्च के आखिरी सप्ताह तक करें मूंग की बुवाई
कृषि विज्ञान केंद्र के कृषि विशेषज्ञ ने बताया कि गर्मी की मूंग की बुवाई मार्च के आखिरी सप्ताह से अप्रैल के पहले पखवाड़े तक करना उपयुक्त माना जाता है। बीज दर लगभग 8 से 10 किलो प्रति एकड़ रखी जाती है। कतार से कतार दूरी 30 सेंटीमीटर और पौधे से पौधे की दूरी 8 से 10 सेंटीमीटर रखना बेहतर रहता है। खाद प्रबंधन में प्रति एकड़ 40 से 50 किलो डीएपी या करीब 100 किलो एसएसपी और थोड़ी मात्रा में यूरिया देने से फसल की शुरुआती बढ़वार अच्छी होती है। कृषि विज्ञान केंद्र के प्रभारी डॉ. राकेश तिवारी का कहना है कि सहफसली खेती पर जोर दिया जा रहा है। 50 बीघा में किसान इसकी खेती के लिए सहमत हुए हैं।
बयान...
यदि सही तरीके से खेती की जाए तो मूंग से प्रति एकड़ 5 से 7 क्विंटल तक उत्पादन मिल सकता है। यह किसानों के लिए सहफसली के तौर पर कारगर फसल है। -डाॅ. नवीन चंद्र,
कृषि विशेषज्ञ, स्वामी कल्याण देव कृषि विज्ञान केंद्र, हस्तिनापुर