डेढ़ दशक पहले तक अवैध हथियारों में तमंचा और देशी बंदूक का चलन ज्यादा था। पिस्टल जैसे सेमी ऑटोमेटिक हथियार तब चुनिंदा और बड़े बदमाशों के पास ही नजर आते थे। लेकिन अब हालात ये हैं कि अधिकांश वारदातों में पिस्टल का इस्तेमाल ज्यादा नजर आता है। इसकी पुष्टि घटना और लगातार पकड़े जाने वाली अवैध हथियाराें की खेप से होती है। सेमी ऑटोमेटिक पिस्टल और रिवाल्वरों से बदमाशों की हथियारों की क्षमता भी पुलिस के बराबर पहुंच रही है। यह हालात पुलिस के लिये एक बड़ी चुनौती है।
छोटे बदमाशों की पकड़ में तमंचा
मेरठ परिक्षेत्र में तमंचा फैक्ट्री स्थानीय स्तर पर चलती रही हैं। मेरठ और मुजफ्फरनगर के आधा दर्जन से ज्यादा गांव ऐसे हैं, जहां आज भी तमंचे बनते हैं। जहां 315 बोर के साथ 12 बोर का तमंचा और देशी बंदूक बनाई जाती है। अब इनकी खपत पहले से कम हो गई है, हालांकि कम कीमत होने के कारण कुछ लोग अभी भी इसे खरीदते हैं और छोटे बदमाशों की पकड़ में भी अभी यह हथियार है। इसकी कीमत दो हजार से पांच हजार रुपये तक है, जबकि देशी बंदूक अधिकतम 10 हजार रुपये तक मिल जाती है।
पिस्टल की बढ़ रही मांग
लेकिन पिछले 15 सालों में पिस्टल की मांग तेजी से बढ़ी है। सेमी ऑटोमेटिक हथियार होने के साथ ही साइज में छोटी होने के कारण बदमाश जहां इसका जहां ज्यादा प्रयोग करते हैं तो लाइसेंसी असलहों में भी इसकी ज्यादा डिमांड है। 0.32 बोर, 0.30 बोर और 9 एमएम में यह पिस्टल उपलब्ध है। जानकारों की मानें तो बदमाशों से ज्यादा युवा वर्ग सुरक्षा और शौक के लिए पिस्टल ज्यादा खरीद रहा है। इसका बड़ा कारण यह है कि अब इसकी कीमत उनकी पहुंच में है। पिस्टल की कीमत 25 हजार से 70 हजार रुपये तक है। इनमें सबसे ज्यादा कीमत 9 एमएम पिस्टल की है। एक जमाना था कि पिस्टल और रिवाल्वर विदेशी ही होते थे और इनकी कीमत डेढ़ लाख रुपये कम से कम होती थी। लेकिन अब यह दोनों ही हथियार अवैध रूप से भी बनने लगे है। हालांकि यह आश्चर्य से कम नहीं है कि पिस्टल जैसे हथियार देसी तौर पर बन रहे है। तमंचे और देसी बंदूके तो छोटे-मोटे यंत्रों के सहारे बन जाते है लेकिन पिस्टल या रिवाल्वर को बनाने के लिये बड़ी खराद मशीनों की जरूरत होती है। जिसके जरिये इनके कल-पुर्जों को आकार दिया जा सके। कारखानों में ही यह काम संभव है और बिना पुलिस और राजनीतिक संरक्षण के संभव नहीं है।
जानकारों की मानें तो पिछले 10 वर्षों में अवैध हथियारों के धंधे से जुड़े लोगों ने इसी संरक्षण के बलबूते छोटे-मोटे कारखाने जैसे खड़े करके पिस्टल और रिवाल्वर जैसे हथियार बनाने में महारत हासिल कर ली है। सूत्र बताते है कि अवैध हथियार बनाने वाले कारबाइन तक बनाने लगे है। लेकिन अभी यह आम नहीं है और तकनीकी रूप से देसी कारबाइन बेहतर नहीं है। लेकिन यही हालात रहे तो जैसे पिस्टल को बनाने में अवैध हथियार बनाने वाले सफल रहे वे अच्छे किस्म की कारबाइन बनाने में भी सफल हो जाएंगे।
01 पिस्टल के साथ दो मैगजीन
अवैध पिस्टल विक्रेता एक पिस्टल के साथ दो मैगजीन देते हैं। एक मैगजीन पिस्टल में फिट होती है और दूसरी उसके साथ अलग से दी जाती है। इसके बाद भी यदि कोई अतिरिक्त मैगजीन लेना चाहता है, तो उसे तीन हजार रुपये अतिरिक्त देने पड़ते हैं और उसे मैगजीन उपलब्ध हो जाती है।
400 रुपये तक का कारतूस
पिस्टल के कारतूस महंगे मिलते हैं। इसमें 0.32 बोर का देशी कारतूस ही अवैध तरीके से 200 रुपये का मिलता है, जिसकी बाजार में कीमत करीब 100 रुपये है। प्रतिबंधित बोर 9 एमएम और 0.30 बोर का कारतूस 400 रुपये तक का मिलता है। यह कारतूस हथियार तस्कर ही उपलब्ध कराते हैं या कुछ बदमाशों की सेटिंग कुछ पुलिस वालों से होती है, जिनके द्वारा कारतूस मिल जाते हैं।
बिहार सबसे बड़ा केंद्र
पिस्टल की मुख्य आपूर्ति बिहार के मुंगेर से होती है। मुंगेर की पिस्टल सस्ती भी हैं। मुंगेर से आनी वाली पिस्टल अधिकतम 30 हजार रुपये में मिल जाती है, जबकि नेपाल या पंजाब से आनी वाली पिस्टल तकनीकी तौर पर ज्यादा एडवांस और भरोसेमंद होती है, जिनकी कीमत 50 हजार रुपये तक होती है।
मुजफ्फरनगर दंगे के बाद बढ़े रेट
उधर, कुछ हथियार तस्करों की मानें तो मुजफ्फरनगर दंगे से पहले पिस्टल की डिमांड कम थी। ऐसे में 20 हजार से 40 हजार रुपये तक पिस्टल मिल जाती थी। लेकिन अब इनकी कीमत में पांच से दस हजार रुपये की बढ़ोतरी हो चुकी है। इसके अलावा अब हथियार तस्करी का खतरा भी थोड़ा बढ़ गया है।
वारदातों में पिस्टल आई सामने
अधिकतर बदमाश पिस्टल का प्रयोग कर रहे हैं। एक साल में जितनी भी फायरिंग की घटनाएं हुई हैं, उनमें चाहे हत्या, लूट हो या जानलेवा हमला, अधिकांश में हमलावरों ने पिस्टलों का प्रयोग किया है। इससे साफ है कि अब बदमाश एक फायर करने वाले तमंचे पर नहीं, बल्कि लगातार छह राउंड फायर करने वाले पिस्टल पर भरोसा करते हैं।
पकड़ी जा चुकीं बड़ी खेप
पिछले छह माह में दिल्ली पुलिस के साथ ही मेरठ, गाजियाबाद, मुजफ्फरनगर आदि जनपदों में पुलिस हथियार तस्करों को पकड़कर उनके पास से भारी संख्या में पिस्टल बरामद कर चुकी है। 2015 में गाजियाबाद में क्राइम ब्रांच की टीम को लीड कर रहे अवनीश गौतम ने 37 पिस्टल बरामद की थीं। वहीं, तीन माह पहले कैराना में ही अवनीश गौतम ने पुलिस टीम के साथ 700 कंट्री मेड पिस्टल बरामद की थीं। दिल्ली पुलिस भी कुछ माह पहले हथियार तस्करों से करीब 50 पिस्टल बरामद कर चुकी है। ये सभी पिस्टल बिहार, मध्य प्रदेश और पंजाब से लाई गई थीं।