आपराधिक गतिविधियों में शामिल होने के चलते दी जाने वाली सजा में महिला-पुरुष के लिंग भेद पर गौर नहीं किया जाता। लेकिन एक मामले की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं को दी जाने वाली सजा में उदारता बरतने के निर्देश दिए हैं। टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर के मुताबिक महिला के अगर तीन या उससे ज्यादा बच्चे हैं, तो उसे दी जाने वाली सजा में उदारता बरती जाए।
लेकिन अगर दोषी पाई गई महिला आतंकीगतिविधियों में शामिल हो तो उसे सख्त सजा ही दी जाएगी। दरअसल, एक महिला ने साल 2000 में एक शख्स की मदद से 27 हजार रुपये लूटे थे। इसके बाद महिला पर आरोप साबित होने के बाद उसे करीब 10 साल की सजा सुनाई गई।
इसके बाद चम्बा के ट्रायल कोर्ट ने गौर किया कि आरोपी महिला के तीन बच्चे हैं, जिनमें से दो मानसिक तौर पर बीमार है। उसने महिला की सजा दो साल कर दी और जुर्माना भी लगाया। लेकिन हिमाचल प्रदेश के हाईकोर्ट ने महिला के हालातों को देखते हुए उसकी सजा माफ कर दी और उसे तीस हजार रुपये का जुर्माना देने के आदेश दिए।
हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। ए के सिकरी और अशोक भूषण की पीठ ने कहा कि अपराधी महिलाओं को सजा देने में उदारता बरती जाए, लेकिन ट्रायल कोर्ट की दी गई सजा को पूरी तरह खत्म करना भी गलत होगा।