मेडिकल कॉलेज में साथी छात्र संजीत सिंह की मौत से एमबीबीएस छात्रों का गुस्सा भड़क गया। छात्रों ने इमरजेंसी में घुसकर तोड़फोड़ शुरू कर दी। इस दौरान संजीत को लेकर जूनियर डॉक्टरों ने अशोभनीय टिप्पणी कर दी, जिस पर बेकाबू हुए छात्रों ने एक दर्जन से ज्यादा जूनियर डॉक्टरों को दौड़ा-दौड़ाकर पीटा। छात्रों ने जूनियर डॉक्टर अरुण कुमार के घर में भी तोड़फोड़ कर डाली। इस दौरान डॉक्टरों और छात्रों के बीच पथराव भी हुआ।
एमबीबीएस छात्रों ने इमरजेंसी में तोड़फोड़ करते हुए आरोप लगाया कि जूनियर डॉक्टरों की लापरवाही से ही छात्र संजीत की मौत हुई है। इस पर कुछ जूनियर डॉक्टरों ने संजीत को लेकर टिप्पणी की तो छात्र और भड़क गए। उन्होंने जूनियर डॉक्टरों पर हमला बोल दिया। इस दौरान जूनियर डॉक्टर और छात्र आमने-सामने आ गए।
मारपीट और पथराव के बीच इमरजेंसी में भगदड़ मच गई। छात्रों ने जूनियर डॉक्टरों को दौड़ा लिया। इस दौरान डॉ. शिवम वाजपेयी समेत दर्जन भी जूनियर डॉक्टर चोटिल हो गए। यहां से कुछ छात्र जूनियर डॉक्टर अरुण कुमार के आवास पर पहुंच गए। छात्रों के आने की सूचना पर डॉ. अरुण वहां से निकल गया। जिस पर छात्रों ने घर में तोड़फोड़ कर दी।
‘तुम केवल राजनीति करते हो’
गुस्साए एमबीबीएस छात्रों ने जूनियर डॉक्टरों को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि तुम लोग इलाज के बजाए राजनीति करते हो। तुमने मेडिकल कॉलेज का माहौल बिगाड़कर रख दिया है। तुम्हारा पढ़ाई और इलाज से कोई वास्ता नहीं है। जूनियर डॉक्टरों ने जब हड़ताल की धमकी दी तो छात्र फिर भड़क गए। कहा कि अपनी कमी छिपाने के लिए तुम्हारे पास बस यही एक हथियार होता है। जब वह अपनी नाकामी छिपानी होनी होती है तो हड़ताल की धमकी दे देते हो। देर रात तक हंगामा चलता रहा।
पुलिस पहुंचकर लौटी
इमरजेंसी और मेडिकल कॉलेज अस्पताल में हंगामे की सूचना पर मेडिकल थाना पुलिस वहां पहुंची। एसओ मेडिकल रविंद्र वशिष्ठ ने बताया कि एमबीबीएस छात्र और जूनियर डॉक्टरों में विवाद की सूचना पर पुलिस गई थी लेकिन मेडिकल कॉलेज के बाहर मिले दो डॉक्टरों ने इससे इंकार कर दिया। जिसके बाद पुलिस लौट गई।
महंगी फीस पर घर पर होती है प्रैक्टिस
एमबीबीएस के छात्रों ने शुक्रवार रात जमकर हुए हंगामे के बीच आरोप लगाया कि मेडिकल कॉलेज के कई सीनियर डॉक्टर सरकारी इलाज कम लेकिन प्राइवेट तौर पर महंगी फीस लेकर अपने घरों या निजी अस्पतालों में मरीज बुलाकर इलाज करते हैं। कमीशनखोरी चरम पर है। कमीशन के खेल में मरीजों की महंगी जांच बाहर से कराई जाती हैं। निजी प्रैक्टिस से सीनियर डॉक्टर नोट कमाते हैं। उन्हें मेडिकल कॉलेज में आने वाले आम मरीजों के इलाज से कोई सरोकार नहीं है। यही नहीं, अपनी प्राइवेट प्रैक्टिस के चलते वे मेडिकल कॉलेज में शिक्षण कार्यों से भी दूर हो गए हैं।