पीड़ित के अनुसार, जेल जाने के बाद वह तीन माह तक जेल में रहकर जमानत पर बाहर आया। इसके बाद शुरू हुआ उसके कोर्ट-कचहरी के चक्कर काटने का अनवरत सिलसिला, जो लगातार 24 साल तक चलता रहा। रामरतन के आर्म्स एक्ट का यह मुकदमा सीजेएम कोर्ट में चला, जिसमें लंबी सुनवाई हुई। इस दौरान सैकड़ोबार रामरतन तारीख पर कोर्ट-कचहरी पहुंचा, जिससे उसका काम-धंधा भी प्रभावित हुआ और परिवार पर भी असर पड़ा।
हालांकि 24 साल लंबी सुनवाई में शहर कोतवाली पुलिस पीड़ित रामरतन के खिलाफ किसी तरह के पुख्ता सुबूत कोर्ट में पेश नहीं कर पाई, जिसके बाद आखिरकार 24 साल बार सीजेएम कोर्ट ने रामरतन को दोषमुक्त करार देते हुए मुकदमे से बरी कर दिया।
24 साल लंबी इस लड़ाई को जीतने वाले रामरतन का कहना है कि उसे उस समय भी पुलिस द्वारा झूठे इल्जाम में जेल भेजा गया था। वह लगातार फरियाद करता रहा, लेकिन कहीं कोई सुनवाई नहीं हुई।
पुलिस की इस हठधर्मिता के चलते उसे बेकसूर होने के बावजूद तीन माह की जेल काटनी पड़ी और 24 साल तक कोर्ट-कचहरी के धक्के भी खाने पड़े। हालांकि, ईश्वर पर उसे भरोसा था, जो 24 साल बाद अब सही साबित हुआ।
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