वह बताते हैं कि दूसरा भाई जाहिद मुंबई में फंसा हुआ था, घर में कोई नहीं था। वह जाना नहीं चाहते थे, सवाल लोगों के स्वास्थ्य का था। मगर, जाना पड़ा। पिता को सुपुर्द-ए-खाक करने के बाद उनके मन में ड्यूटी का ही सवाल उठता रहा। किसी तरह पहले दो दिन खुद को रोके रखा, लेकिन तीसरे दिन वह अपना बैग उठाकर खेकड़ा सीएचसी पहुंच गए। कोविड़-19 अस्पताल की जिम्मेदारी संभाल ली।
वह बताते हैं कि पिता ने ही कर्म करने की सीख दी थी, इसलिए वह अपने कर्मक्षेत्र में लौट आए हैं। पिता उनके दोस्त थे, वह चले गए, कभी नहीं आएंगे। इसका मलाल है, लेकिन महामारी के खिलाफ चल रही लड़ाई में वह अपने साथी डॉक्टर, नर्स, स्वास्थ्य कर्मचारियों और पुलिस-प्रशासन के साथ हिस्सा बनना चाहते थे, यही उनके लौट आने की वजह रही।