सोनू शेखर और उनकी माता का फाइल फोटो।
- फोटो : amar ujala
बेटे की कोरोना से मौत के बाद बूढ़ी मां की सांसों की डोर भी टूट गई। जिस बेटे ने मां के लिए सबकुछ छोड़ दिया वह मां की दफीने की इच्छा पूरी करने के लिए इस दुनिया से पहले ही चला गया। दोस्तों-परिचितों ने वृद्धा का मुस्लिम रीति-रिवाज से अंतिम संस्कार किया।
राजकीय हाईस्कूल कुढ़ला के प्रधानाचार्य सोनू शेखर की मां कमलेश देवी का भी बुधवार को अस्पताल में निधन हो गया। वे 80 साल की थीं। सोनू शेखर के पिता श्यामलाल सरकारी अधिकारी थे। उनकी तीन संतान हैं। बेटे सोनू शेखर, एक अन्य बेटा और एक बेटी। सोनू शेखर की मां मुस्लिम थीं। श्यामलाल की मौत के बाद उनके बड़े बेटे और बेटी ने मुस्लिम धर्म अपना लिया, लेकिन सोनू ने पिता के धर्म को अपनाया। भाई-बहन अलग हो गए। मां सोनू के साथ ही रहीं। वे मुस्लिम धर्म को मानती थीं। सोनू शेखर गीता पढ़ते थे और मां कुरान शरीफ। दिवाली पर दीये जलते थे तो ईद पर शीर भी बनती थी। सोनू शेखर को अहसास था कि शादी करेंगे तो मां को बहू शायद स्वीकार न करे। ऐसे में उन्होंने शादी ही नहीं की। लोन लेकर घर बनाया। मां बीमार रहने लगी तो अस्पताल की तरह घर में ही दो नर्सें रख लीं। वे मां को इतना मानते थे कि उनके लिए सबकुछ कुर्बान कर दिया।
तीन मई को सोनू शेखर को कोरोना संक्रमण होने के बाद न्यूटिमा अस्पताल में भर्ती कराया गया। कुछ दिन बाद ही उनकी मां की तबीयत भी बिगड़ गई। सोनू के कहने पर दोस्तों ने उन्हें भी न्यूटिमा में ही भर्ती करा दिया, लेकिन सोनू की हालत बिगड़ती चली गई। 15 मई को उन्हें मेडिकल कॉलेज में भर्ती कराया गया। सोनू ने परिचितों से कहा कि मुझे कुछ हो भी जाए तो भी मां के ठीक होने तक उनको कुछ नहीं बताना। वे मेरे बिना जी नहीं पाएंगी। 15 मई की रात सोनू का मेडिकल कॉलेज में निधन हो गया। 16 मई को दोस्तों और परिचितों ने उनका अंतिम संस्कार कर दिया, लेकिन बदनसीबी देखिए कि अपनों ने मुंह मोड़ लिया। बड़ा भाई इस मौके पर भी नहीं पहुंचा। अस्पताल में जिंदगी से जूझ रही कमलेश देवी की सांसों ने भी बुधवार सुबह साथ छोड़ दिया। सोनू शेखर की इच्छा थी कि मां जब मुस्लिम धर्म को मानती हैं तो उनका अंतिम संस्कार भी मुस्लिम रीति-रिवाज से हो। इसके चलते उनका दफीना किया गया।