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महाभारत युद्ध के दौरान हथियार बनाने में ताम्र धातु का होता था प्रयोग

Tue, 12 Jun 2018 11:43 AM IST
यूपी अमर उजाला ब्यूरो, बागपत
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5000 हजार साल पुरानी ताम्र निर्मित तलवार मिली - फोटो : अमर उजाला
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बागपत में सिनौली साइट पर एएसआई द्वारा कराए गए उत्खनन कार्य में पुरातत्वविदों को एक ऐसी सफलता हाथ लगी है, जिसने पूरे विश्व का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। साइट से एक 5000 हजार साल पुरानी ताम्र निर्मित तलवार प्राप्त हुई है। पुरातत्वविदों का दावा है कि इस तरह की तलवार विश्व में पहली बार सिनौली से प्राप्त हुई है। इसके अलावा साइट से 17 पॉट व अन्य पुरावशेष भी प्राप्त हुए हैं।

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उधर दुनिया भर में छाए सिनौली उत्खनन के इतिहास को जानने के लिए घरों से महिलाएं घूंघट में बाहर निकलकर साइट पर पहुंच रही हैं। विश्व के सबसे बड़े शवाधान केंद्र के रूप में जानी जाने वाली सिनौली साइट पर 2006 के बाद फिर से भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण संस्थान लाल किला के निदेशक डा. संजय मंजुल के निर्देशन में उत्खनन कराया जा रहा है। केवल एक ही स्थान पर लगाए गए ट्रेंच से फिर से यहां से चार कंकाल प्राप्त हुए थे।
 
इसके अलावा यहां दुर्लभ ताम्रनिधि, युद्ध में प्रयोग किए जाने वाले तांबे से बने खंडित पुरावशेष भी प्राप्त हुए। इस सबके बीच साइट पर लगाए गए एक ट्रायल ट्रेंच से पुरातत्वविदों को 5000 साल पुरानी ताम्र निर्मित तलवार भी हाथ लगी है। यह तलवार 2007 में प्राप्त हुई दो ताम्र निर्मित तलवारों से साइज से बड़ी और अलग भी है। महाभारत काल में वैसे तो स्वर्ण, ताम्र धातु का प्रयोग बहुतायत में होने के प्रमाण मिलते रहे हैं, लेकिन सिनौली साइट से प्राप्त पुरावशेषों से माना जा रहा है कि युद्ध में प्रयोग किए जाने वाले हथियारों में ताम्र धातु का सबसे अधिक प्रयोग होता था। 
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हथियार बनाने में विशेष तकनीक का प्रयोग किया जाता था क्योंकि योद्धा के हथियार, कवच, हेलमेट आदि जितनी अच्छी और बेहतर आकृति फिनिशिंग के साथ तैयार की गई है, वह सब सिनौली से प्राप्त पुरावशेषों को देखने भर से हो जाती है। इस बात को भी इंकार नहीं किया जा सकता कि हथियारों को तैयार करने की एक तरह की प्रयोगशाला भी उस समय रही होगी, जहां इन हथियारों को बनाने में स्वर्ण, ताम्र धातु को गलाने का कार्य किया जाता था।

पढ़ें : बागपत: सुर्खियों में सिनौली, सामने आई 4000 साल पुरानी सभ्यता, देखिए तस्वीरें

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2006 में मिला था सिनौली से बेहद कीमती खजाना

सिनौली उत्खनन - फोटो : अमर उजाला
2005-06 में सिनौली साइट से दुनिया पहले ही रूबरू हो चुकी है। उस समय खुदाई के दौरान दो तांबे की तलवार, एक तांबे की म्यान, चार सोने के कंगन, एक सोने से बना मनके का हार, एक सोने की लघु मानवाकृति, सैकड़ो मनकें, 177 मानव कंकाल समेत अन्य पुरावशेष प्राप्त हुए थे। इतनी बड़ी संख्या में यहां से कंकाल व पुरावशेष मिलने के बाद इस साइट को विश्व के सबसे बड़े शवाधान केन्द्र के रूप में भी पुष्ट किया जा सकता था। 

विश्व की अमूल्य धरोहर है सिनौली साइट 
शहजाद राय शोध संस्थान के निदेशक अमित राय जैन ने बताया कि सिनौली साइट विश्व की सबसे अमूल्य धरोहर है। शवाधान केन्द्र में अपनाई जाने वाली प्रक्रियाएं हूबहू उसी तरह हैं, जैसी वैदिक काल में अपनाई जाती थी और इनका जिक्र ऋग्वेद, शतपथ ब्राहण ग्रंथ, गरुड़ संहिता में भी है। इन वेद, पुराण में वर्णित मंत्रों में जो प्रक्रियाएं बताई गई हैं, वे ही सिनौली शवाधान केंद्र पर अपनाई गई है। यह बहुत महत्वपूर्ण है कि वैदिक कॉल, हड़प्पाकालीन, ताम्रयुगीन सभ्यता, संस्कृति के प्रमाण सिनौली में मौजूद है।

अन्य जनपदों से भी लोग पहुंच रहे
सिनौली उत्खनन आज देश-दुनिया की सुर्खियों में छाया है। बागपत ही नहीं अन्य जनपदों व दूरदराज से लोग यहां पर उत्खनन देखने के लिए पहुंच रहे हैं। हालांकि किसी बाहरी व्यक्ति को उत्खनन स्थल पर जाने की अनुमति नहीं है। फिलहाल उत्खनन अंतिम दौर में है। सिनौली उत्खनन को देखने के लिए अब घरों से महिलाएं बच्चों के साथ बाहर निकल रही है और उत्खनन स्थल पर पहुंचकर इतिहास जानने की जिज्ञासा दिखा रही हैं।

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