जनता दल के विघटन और बाबरी ढांचे के विध्वंस के बाद मजगर फार्मूला भी बिखर गया। इसके बाद चौधरी अजित सिंह ने लोकदल (अ) का विलय कांग्रेस में कर दिया। लेकिन कुछ समय बाद ही यहां से निकलकर अजित सिंह ने पहले भारतीय किसान कामगार पार्टी बनाई और इसके बाद वर्ष 2000 में रालोद का गठन कर लिया।
पश्चिमी यूपी में उन्हें जाट और मुसलमानों का साथ मिलता रहा और उनकी पार्टी के विधायक और सांसद चुने जाते रहे। लेकिन वर्ष 2013 में मुजफ्फरनगर दंगे के बाद जाट-मुस्लिम गठजोड़ टूटने से रालोद को बड़ा झटका लगा।
इसके चलते लोकसभा चुनाव 2014 में चौधरी अजित सिंह और उनके बेटे जयंत चौधरी भी चुनाव हार गए। तमाम कोशिशों के बाद भी विधानसभा चुनाव 2017 में पार्टी को करारी हार का सामना करना पड़ा था।
छपरौली सीट से जीते एकमात्र विधायक को भी भाजपा ने तोड़कर अपने पाले में करके पार्टी को शून्य पर लाकर खड़ा कर दिया था। लेकिन कैराना लोकसभा उपचुनाव में सपा-बसपा के साथ आने से एक नया फार्मूला ’मजाद’ इजाद हो गया।
कैराना लोकसभा उपचुनाव में रालोद की जीत ने साबित कर दिया है कि रालोद सुप्रीमो चौधरी अजित सिंह मुजफ्फरनगर दंगे के बाद टूटे जाट-मुस्लिम गठजोड़ को फिर से बनाने में कामयाब हो गए।
जाट बाहुल्य गांवों के अलावा उन गांवों के जाटों ने भी रालोद को भाजपा से ज्यादा वोट दिया जो गांव दंगे से प्रभावित हुए थे। करीब पांच साल बाद ही टूटे भाईचारे के फिर से बहाल होने से भाजपा के लिए बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है।
दंगे के बाद से चौधरी अजित सिंह से दूरी बनाए रखना भाजपा को भारी पड़ती नजर आ रही है। पश्चिमी यूपी के मुजफ्फरनगर, सहारनपुर, मेरठ, बागपत, आगरा, बुलंदशहर सहित कई जिले ऐसे हैं जहां जाट मुस्लिम और साथ में दलित वोट लोकसभा व विधानसभा चुनावों में भारी उलट फेर कर देंगे।
कैराना लोकसभा उपचुनाव सीट गठंबधन में शामिल और पश्चिमी यूपी में प्रभाव रखने वाली रालोद के हिस्से आई थी। पिछले कई महीनों से क्षेत्र में घूमकर हिंदू-मुस्लिम एकता को बहाल करने में जुटे चौधरी अजित सिंह से क्षेत्र के लोग यहां से जयंत चौधरी को लड़ाने की मांग कर रहे थे।
लेकिन चौधरी अजित सिंह ने सीट खाते में आने के बाद पूर्व सांसद तबस्सुम हसन को पार्टी प्रत्याशी बनाया। मुस्लिम प्रत्याशी बनाने पर भाजपा नेताओं की बांछें खिल गई और उनके नेताओं ने जाट बाहुल्य गांवों में पहुंचकर दंगे के जख्मों को कुरेदना शुरू कर दिया।
तबस्सुम हसन के बेटे विधायक नाहिद हसन के दिए गए बयानों को भी याद दिलाया गया। लेकिन चौधरी अजित सिंह और जयंत चौधरी की कड़ी मेहनत और सधी चाल ने भाजपा की रणनीति को बोथरा कर दिया। टिकट देने के बाद चौधरी अजित सिंह का यह बयान बड़ा कारगर साबित हुआ कि उन्होंने पार्टी प्रत्याशी को नहीं बल्कि सद्भावना और भाईचारे को टिकट दिया है।
इसके बाद उनका दंगा पीड़ित गांवों में जाकर सीधे जनसंवाद करना चुनाव का सबसे बड़ा टर्निंग प्वाइंट रहा। कुछ लोगो ने दंगे के बाद उनकी खामोशी पर सवाल भी उठाए। गिले-शिकवे भी किए लेकिन चौधरी अजित सिंह की उम्र और उनके द्वारा कराए गए कामों की फेहरिस्त के आगे किसी की नहीं चली।
भाजपा अजित सिंह और जयंत चौधरी द्वारा उठाए गए गन्ना बकाया भुगतान, कर्जमाफी, जाट आरक्षण और फसल का डेढ़ गुणा रेट मुद्दे में दबती चली गई। इसका असर यह हुआ कि जाट बाहुल्य गांवों में पूर्व केंद्रीय मंत्री डॉ संजीव बालियान सरीखे नेता को भी तीखे सवालों और हंगामे के चलते वापस लौटना पड़ा।
गोरखपुर और फूलपुर के बाद कैराना और नूरपुर में मिली जीत सपा के लिए किसी संजीवनी से कम हीं है। सपाई अब 2019 की तैयारी में जुटेंगे। इस जीत को नजीर बनाएंगे और जनता को बताकर इसे भुनाने की कोशिश करेंगे।
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि जल्द ही सपाइयों को हाईकमान से गाइडलाइंस भेजी जाएगी, जिसमें दिशा-निर्देश रहेंगे कैसे 2019 में पार्टी को मजबूत करना है। इस उपचुनाव में सपाइयों ने जाट बहुल गांवों में जाने से परहेज किया। यह गठबंधन की राजनीति का एक हिस्सा था। दरअसल, गठबंधन को डर था कि कहीं दंगे की बातें गठबंधन और वोटरों को प्रभावित न कर दें।
मेरठ की ही बात करें तो यहां से चुनाव से 10 दिन पहले से 50 से ज्यादा सपा कार्यकर्ता मतगणना होने तक कैराना क्षेत्र में डेरा डाले रहे। यह चुनाव सपा के लिए 2019 की नींव है। यह एक लिटमस टेस्ट था, जिसमें गठबंधन और सपा दोनों पास हो गए हैं।
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