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दिल्ली से कोलकाता तक इस गांव के 'वरक' की चमक,70 बरस से विरासत को आगे बढ़ा रही पीढ़ी-दर-पीढ़ी

Fri, 13 Dec 2019 02:45 PM IST
कपिल kapil न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मेरठ
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चांदी की वरक तैयार करते कारीगर - फोटो : अमर उजाला
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मेरठ के कांशी गांव में बनने वाला चांदी का वरक लंबी यात्रा तय कर चुका है। चार आने से शुरुआत करने वाली वरक की गड्डी की कीमत आज 110 रुपये है। यहां की हुनरमंद कारीगरी अब सोने के वरक तक पहुंच चुकी है। 70 बरस से कांशी के कारीगर इस विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं...

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कांशी गांव की संकरी गलियां और वहां से निकलने वाली ठक-ठक की कर्णप्रिय आवाजें! ऐसा लगता है जैसे वाद्ययंत्रों की संगत हो रही हो। असलियत में यह उन कारीगरों के हथौड़ों की आवाजे हैं, जो चांदी के छोटे-छोटे टुकड़ों को सात इंच के वरक में तब्दील कर रहा होता है। वही वरक जो मिठाई के ऊपर चिपकने के बाद आपके खाने की इच्छा को बढ़ा देता है। यह काम यहां 70 बरस से हो रहा है। कांशी के करीब 70 परिवार वरक की कारीगरी में लगे हैं। यह उनकी तीसरी पुश्त है। यहां बने वरक की मांग दिल्ली से लेकर कोलकाता तक है। 

तंबाकू और दवाइयों में भी डालते हैं वरक
उम्र के 75 वसंत पार कर चुके आबिद हुसैन बताते हैं कि वर्ष 1960 से मेरठ के वरक की सप्लाई दिल्ली से लेकर कोलकाता तक हो रही है। वरक का इस्तेमाल तंबाकू और दवाइयों में भी होता है, पर कांशी के वरक का प्रयोग ज्यादातर मिठाइयों में होता है। चाहे दिल्ली हो या मेरठ के प्रमुख मिष्ठान विक्रेता रोहताश से लेकर बंगाल स्वीट्स तक। सभी कांशी के बने वरक को प्राथमिकता देते हैं। वरक अच्छा वही माना जाता है, जो फूंक मारने पर टूटता नहीं। यही इसकी शुद्धता की पहचान है। अगर फूंक मारने पर कई हिस्सों में बिखर जाए तो समझिए मिलावटी है। वरक बनाने के लिए चांदी के 100 ग्राम के पतरे (पर्ण) से 10 ग्राम के दस पतरे बनाए जाते हैं। फिर दस ग्राम के पतरे को 149 पीस में बांटा जाता है। इन्हीं छोटे टुकड़ों को बटर पेपर के बीच में रखकर हथौड़े से कुटाई की जाती है। तब जाकर सात-सात इंच के चांदी के वरक तैयार होते हैं।

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आबिद हुसैन बताते हैं कि 1960 में एक गड्डी (149 पीस) चांदी के वरक के दाम चार आने मिलते थे। अब 110 रुपये कीमत है। इसे बनाने का हुनर पीढ़ी दर पीढ़ी ट्रांसफर हो रहा है। आबिद हुसैन ने अपने मामा से सीखा था। अब उनके बेटे जावेद और मुरसलीन के हाथ भी वर्क बनाने में हुनरमंद हो चुके हैं। बकौल आबिद अब तक वह 700 कारीगर तैयार कर चुके हैं। उन्हीं में से मोबिन और जावेद हैं। जिनके हाथ और हथौड़े के बीच का तालमेल भी गजब का है। छोटे-छोटे से चांदी के पतरों को सात इंच के वरक में तब्दील करने की प्रक्रिया को देखना भी मधुर संगीत को सुनने से कम नहीं है। 

तैयार किए सोमनाथ मंदिर के कलश
कांशी के कारीगर सोने के भी वरक बनाते हैं। जावेद और मुरसलीम रविवार को ही दिल्ली से लौटे हैं। वहां गुजरात के सोमनाथ मंदिर के विशाल कलश और कुछ मूर्तियां लाई गई थीं, जिन्हें स्वर्ण मंडित किया गया। मुरसलीम ने बताया कि वह 12 साल से मंदिर के कलश और मूर्तियों को स्वर्णमंडित करने का काम कर रहे हैं।

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