बसपा ने जिले की सातों विधानसभा सीटों पर अपने प्रत्याशी घोषित कर दिए हैं। जबकि, भाजपा अभी प्रत्याशी चयन की मशक्कत में फंसी हुई है। वहीं, सपा आपसी संघर्ष से नहीं उबर पाई है तो रालोद और कांग्रेस गठबंधन के मझधार में उलझी हुई हैं। बसपा ने आचार संहिता लागू होने से पहले घोषित विधानसभा प्रभारियों को ही उम्मीदवार बनाया है।
जिले में पहले चरण में 11 फरवरी को मतदान होना है। बसपा की सूची से साफ है कि वेस्ट यूपी में वह दलित-मुस्लिम समीकरण के सहारे पहले चरण की शुरुआत करना चाहती है। वहीं, भाजपा की सूची 16 जनवरी को आने की उम्मीद है तो सपा में घमासान के बीच पार्टी के दावेदार असमंजस में हैं। साथ ही गठबंधन की संभावनाओं के कारण रालोद और कांग्रेस ने भी अपने पत्ते नहीं खोले हैं।
सिवालखास
सिवालखास सीट पर पिछली बार रालोद छोड़कर आए पूर्व एमएलसी जगत सिंह को प्रत्याशी बनाकर बसपा ने जाट-दलित समीकरण खेला पर सफलता नहीं मिली। इस बार मुस्लिम चेहरे के रूप में नदीम अहमद को उतारकर यहां भी दलित-मुस्लिम समीकरण बनाया है। यह समीकरण कहीं न कहीं सपा के लिए मुसीबत हो सकता है। वजह यह कि पिछली बार सपा से निर्वाचित गुलाम मोहम्मद तीन जाट प्रत्याशियों के बीच अकेले मुस्लिम थे।
सरधना
बसपा ने इस बार कुछ प्रत्याशी पुराने तो कुछ नए समीकरण पर मैदान में उतारे हैं। हालांकि, बसपा की मुख्य रणनीति दलित-मुस्लिम समीकरण ही है। सरधना सीट पर इमरान याकूब को मैदान में उतारा गया है। यहां पिछले दो चुनाव बसपा ने जाट बिरादरी के चंद्रवीर सिंह के भरोसे लड़े। 2007 में चंद्रवीर जीते तो 2012 में चौथे नंबर पर रहे। इस बार बसपा ने यहां दलित-मुस्लिम समीकरण पर भरोसा किया है। यहां मुस्लिम अच्छी संख्या में हैं। दूसरी पार्टी यहां से मुस्लिम प्रत्याशी उतारती नजर नहीं आ रही है।
हस्तिनापुर
हस्तिनापुर सुरक्षित सीट से बसपा ने एक बार फिर पूर्व विधायक योगेश वर्मा पर भरोसा जताया है। योगेश वर्ष-2007 में यहां से विधायक चुने गए थे, लेकिन 2012 में चुनाव से पहले उन्हें बसपा से बर्खास्त कर दिया गया। इसके बाद वह पीस पार्टी से चुनाव लड़कर न सिर्फ दूसरे नंबर पर रहते हुए बहुत कम अंतर से हारे, बल्कि बसपा प्रत्याशी को चौथे नंबर पर पहुंचाने का काम किया।
मेरठ शहर
मेरठ शहर सीट पर बसपा ने पिछली बार मुस्लिम कार्ड खेला था। हालांकि, वह चेहरा उतना दमदार नहीं था, फिर भी सपा के लिए जरूर वोट काटने का काम किया। इस बार शहर सीट पर बसपा ने पंजाबी कार्ड खेलते हुए पंकज जौली को मैदान में उतारा है। पंकज पंजाबी बिरादरी के वोट लेकर भाजपा के लिए परेशानी का कारण बन सकते हैं।
मेरठ कैंट
कैंट सीट पर बसपा दो बार से पंजाबी कार्ड खेलकर भाजपा को चुनौती देती आ रही है। लेकिन, इस बार जाट कार्ड खेला है। जाट-दलित का यह नया समीकरण भाजपा को परेशान कर सकता है। इसके अलावा बसपा की रणनीति गैर भाजपाई वोटों को अपने पाले में करने की है। ऐसे में अब दूसरी पार्टियों के टिकट पर यहां काफी दारोमदार है।
मेरठ दक्षिण
मेरठ दक्षिण सीट पर समीकरण पिछले चुनाव की तरह ही है। बस चेहरा बदल गया है। पिछली बार बसपा ने युवा चेहरे के रूप में पूर्व सांसद हाजी शाहिद अखलाक के भाई राशिद अखलाक को मैदान में उतारा था और वह दूसरे नंबर पर रहे थे। लेकिन, इस बार पूर्व मंत्री हाजी याकूब कुरैशी को मैदान में उतारा है। याकूब मुस्लिम चेहरे के रूप में बड़ा नाम हैं। ऐसे में बसपा प्रत्याशी इस बार भाजपा के सामने बड़ी चुनौती पेश कर सकते हैं।
किठौर
किठौर सीट पर बसपा पिछले कई चुनावों से गुर्जर कार्ड खेलती आ रही है। इस बार भी गुर्जर कार्ड खेलते हुए गजराज नागर को मैदान में उतारा है। बसपा का यह गुर्जर कार्ड भाजपा के लिए मुसीबत खड़ी कर सकता है। वजह यह कि सपा के शाहिद मंजूर लगातार तीन बार निर्वाचित हो चुके हैं और चौथी बार मैदान में होंगे।
शाहिद अखलाक के साथ शैलेंद्र और संजीव की भी वापसी
मेरठ। पूर्व सांसद हाजी शाहिद अखलाक बृहस्पतिवार को फिर से हाथी पर सवार हो गए। उनके साथ पिछले दिनों बसपा से बर्खास्त किये गये शैलेंद्र सिंह और संजीव की भी वापसी हो गयी है। इन तीनों को गढ़मुक्तेश्वर में आयोजित सम्मेलन में नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने पार्टी ज्वाइन करायी।
हाजी शाहिद अखलाक बसपा से 2014 में लोकसभा चुनाव लड़े थे और 2012 में उन्होंने अपने भाई को दक्षिण विधानसभा सीट से बसपा से विधानसभा चुनाव लड़ाया था। सम्मेलन में नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने शाहिद अखलाक को लोकसभा प्रभारी घोषित किया। इसके साथ ही अखलाक का 2019 में लोकसभा प्रत्याशी बनना तय हो गया है। वहीं कैंट सीट से पूर्व में प्रत्याशी घोषित किये गये शैलेंद्र सिंह की वापसी हुई। शैलेंद्र का टिकट काटकर सतेंद्र सोलंकी को दिया गया है। जबकि संजीव कुमार को पहले सरधना प्रत्याशी घोषित किया गया था, उनका भी टिकट काटकर हाजी इमरान कुरैशी को दे दिया गया।