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क्या वाकई इस कारण नूरपुर विधानसभा सीट हार गई बीजेपी?

Fri, 01 Jun 2018 10:43 AM IST
यूपी अमर उजाला ब्यूरो, बिजनौर
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फाइल फोटो
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बिजनौर में नूरपुर विधानसभा उपचुनाव में दलित व जाटों को बांधने में भाजपा नाकामयाब रही। चुनाव में भाजपा के अपने भी बेगाने बने रहे। चेहरा दिखाने के लिए तो तमाम नेता रहे पर किसी ने चुनाव में जमीनी स्तर पर काम नहीं किया। यही वजह रही कि भाजपा को हार का मुंह देखना पड़ा।

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उपचुनाव में महागठबंधन के निशाने पर जाट व दलित वोट थे। हालांकि भाजपा व सपा दोनों दलों ने बिरादरी में अपने नेताओं की फौज उतार रखी थी। पर जाटों को अपने पाले में लाने के लिए सपा ने पहले से ही तैयारी कर ली थी। सपा ने पूर्व मंत्री स्वामी ओमवेश को चुनाव मैदान में उतार दिया। गठबंधन के तहत रालोद नेता भी चुनाव में उतर गए थे। रालोद के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष जयंत चौधरी की नूरपुर क्षेत्र में सभा कराई गई। इलाके के जाट विधायक स्व.लोकेंद्र चौहान से एक-दो छोटी बात को लेकर नाराज चल रहे थे। इस नाराजगी को भाजपा का कोई नेता दूर नहीं कर पाया। रालोद के नेताओं ने जाट बाहुल्य क्षेत्रों में डेरा डाल रखा था तो पूर्व मंत्री स्वामी ओमवेश सुबह आंख खुलते ही जाटों के घरों पर पहुंच जाते थे और उन्हें सपा को वोट देने की शपथ दिलाते थे। भाजपा नेता सोचते थे कि जाट वोट उनका है। वह उनसे दूर नहीं जाएगा। भाजपा को जाटों को रिझाने के लिए पंचायतीराज मंत्री भूपेंद्र चौधरी, बिजनौर के सांसद भारतेंद्र सिंह समेत कई जाट नेताओं को क्षेत्र में उतार रखा था, पर ये नेता बिखरे जाटों को पाले में लाने में कामयाब नहीं हुए। नूरपुर विधानसभा क्षेत्र में 35 हजार दलित हैं। दलित निर्णायक स्थिति में थे। दलितों को पाले में लाने के लिए भाजपा व गठबंधन के नेताओं में शह मात का खेल चल रहा था। गठबंधन के नेता दलितों की खूब खातिरदारी करने में लगे थे। उन्हें फुसलाने और अपने से जोड़ने में लगे थे।

पढ़ें : वेस्ट में भाजपा का सूपड़ा साफ, कैराना में जीतीं तबस्सुम, नूरपुर विधानसभा सीट सपा ने छीनी

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दलित पहले से थे भाजपा से नाराज

समर्थकों के साथ सपा प्रत्याशी नईमुल हसन - फोटो : अमर उजाला
भाजपा ने नहटौर के विधायक ओम कुमार, नगीना के सांसद डा.यशवंत सिंह, पूर्व आईएएस अधिकारी आर के सिंह और उनकी पत्नी पूर्व राज्य मंत्री ओमवती समेत कई दलित नेताओं को दलितों के बीच उतार रखा था। पर ये नेता दलितों को साधने में कामयाब नहीं हुए। दलित पहले से ही भाजपा से आरक्षण के मुद्दे पर नाराज थे। चुनाव के दौरान चली इस अफवाह का भी भाजपा को नुकसान हुआ कि भाजपा आरक्षण खत्म करना चाहती है। भाजपा नेता सक्रिय तो रहे लेकिन इस अफवाह का प्रभावी काट नहीं कर सके। जाट व दलित वोट का बंटवारा हुआ। काफी वोट सपा प्रत्याशी नईमुल हसन की ओर चला गया।  

सैनी बिरादरी पर भी थी सपा की नजर
उपचुनाव में  सैनी बिरादरी के वोटों पर भी गठबंधन के नेताओं की नजर थी। सपा ने सैनी बिरादरी के नेता मदनलाल सैनी को सैनी बिरादरी में उतार दिया। सपा ने आखिरी समय में महान दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष केशवदेव मौर्य की राजा का ताजपुर में सभा कराकर दांव खेल दिया। सैनियों का कुछ वोट भी सपा की ओर खिसक गया। भाजपा का कट्टर वोट समझने वाले ठाकुरों में भी गठबंधन के नेताओं ने सेंध लगा दी। ठाकुरों का भी कुछ वोट सपा प्रत्याशी की ओर चला गया। चुनाव के दौरान भाजपा के नेताओं ने जमीनी स्तर पर काम नहीं किया, केवल हवा हवाई ही करते नजर आए। इन नेताओं की वजह से ही भाजपा को चुनाव में नुकसान उठाना पड़ा। कई नेता तो ऐसे रहे जो चुनाव में केवल चेहरा दिखाने और अखबारों में खबरें छपवाने तक सीमित रहे। कुछ प्रेस कांफ्रेंस करके ही वापस हो गए।

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