ऐसे कर रहा था छात्र नकल
विश्वविद्यालय की परीक्षाएं सीसीटीवी की निगरानी में कराई जा रही हैं। विश्वविद्यालय स्तर से भी लगातार इसकी मॉनिटरिंग की जा रही है। ऐसे में नकल माफिया ने नकल कराने का तरीका निकाला है। सोमवार को इलेक्ट्रानिक डिवाइस से नकल करते पकड़े गए छात्र अभिषेक की डिवाइस बाहर मौजूद किसी फोन से कनेक्ट थी। अभिषेक धीरे से बोलकर बाहर मौजूद व्यक्ति को सवाल नोट करा देता था। बाहर वाला व्यक्ति उसका उत्तर अभिषेक के कान में लगे माइक्रो स्पीकर के जरिए उसे नोट करा देता था। विद्यालय प्रबंधन अगर सही तरीके से जांच करता तो बाहर से नकल करने वाले को दबोचा जा सकता था। इस मामले में न तो छात्र के विरुद्घ कोई कार्रवाई हुई है और न ही नकल कराने वाले का पता लगाया गया। छात्र अभिषेक के पास मिली डिवाइस में लगे सिम से भी नकल माफिया का पता लग सकता है।
प्रतियोगी परीक्षाओं में आएं हैं नकल के ऐसे तरीके
जिले में विश्वविद्यालय परीक्षाओं ने इलेक्ट्रानिक डिवाइस से नकल करने के मामले ने केंद्र व्यवस्थापकों की नींद उड़ा दी है। जिले में इस तरह पकड़ा गया नकल का यह पहला मामला है। अब तक नौकरी पाने के लिए प्रतियोगी परीक्षाओं में इलेक्ट्रानिक डिवाइस इस्तेमाल करने के मामले सामने आते रहे हैं।
विश्वविद्यालय के उपकुलपति द्वारा गठित उच्च स्तरीयत समिति नकल केस की सुनवाई के बाद दंड तय करती है। आरोपी को तीन साल तक विश्वविद्यालय की परीक्षा से डिबार किया जा सकता है। रूहेलखंड विश्वविद्यालय की परीक्षाएं चल रही हैं। शासन के परीक्षाएं नकलविहीन कराने के निर्देश हैं। इसके लिए परीक्षा केंद्रों के कक्षों में सीसीटीवी कैमरे लगाए गए हैं। विश्वविद्यालय को कतिपय कॉलेज द्वारा दूसरे कमरों में बैठाकर नकल कराने की शिकायत मिल रही थी। परंतु नकलचियों ने इलेक्ट्रानिक डिवाइस से नकल करने का तरीका इजाद कर लिया। नूरपुर के धर्मवीर इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी केंद्र पर विश्वविद्यालय के उड़नदस्ते ने जिस छात्र को इलेक्ट्रानिक डिवाइस से नकल करते पकड़ा है, उसके पास से डिवाइस व स्पीकर बरामद हुआ है। वर्धमान कॉलेज में बीएड विभाग के वरिष्ठ प्रोफेसर डॉ. एसके जोशी के अनुसार इलेक्ट्रानिक डिवाइस से नकल करने का जिले का यह पहला मामला है।
हाईलेवल समिति लेती है फैसला
प्रोफेसर एसके जोशी के अनुसार प्रथम दृष्टया मामला नकल का है। आरोपी छात्र की उत्तर पुस्तिका और पकड़ी गई नकल की सामग्री विश्वविद्यालय को भेजी जाती है। वहां उपकुलपति द्वारा गठित हाईलेवल समिति नकल के मामलों को देखती है। समिति में विश्वविद्यालय के सीनियर प्रोफेसर होते हैं। समिति छात्र के पास से पकड़ी सामग्री और केंद्र व्यवस्थापक की रिपोर्ट का अध्ययन करके निर्णय लेती है। नकल की प्रकृति के आधार पर डिबार का फैसला होता है। आम तौर पर आरोपी का चालू साल तो खराब हो ही जाता है। गंभीर मामला मिलने पर आरोपी छात्र को दो से तीन साल के लिए डिबार किया जा सकता है।
आरोपी के खिलाफ नहीं होती एफआईआर
नकल के मामलों में यूपी बोर्ड और विश्वविद्यालय की परीक्षाओं में दोहरी व्यवस्था है। इसका असर विश्वविद्यालय परीक्षाओं में नकल रोकने पर पड़ रहा है। प्रोफेसर एसके जोशी के मुताबिक विश्वविद्यालय परीक्षाओं में नकल पकड़े जाने पर आरोपी छात्र के खिलाफ पुलिस में एफआईआर करने का कोई प्रावधान नहीं है। आरोपी का प्रकरण विश्वविद्यालय को ही भेजा जाता है। यूपी बोर्ड की हाईस्कूल, इंटरमीडिएट की परीक्षाओं में नकल को संज्ञेय अपराध माना गया है। नकलची के खिलाफ पुलिस में एफआईआर होती है।
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