बिजनौर। मातृभाषा हिंदी की सेवा करने वालों की जिले में लंबी सूची है। उन्होंने अपनी साहित्य साधना से हिंदी को शिखर पर पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इनमें कई नाम तो ऐसे हैं जिन्होंने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हिंदी की ख्याति को और प्रखर किया है। अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस पर प्रस्तुत है जिले के ऐसे ही साहित्य साधकों के व्यक्तित्व और कृतित्व।
स्वामी श्रद्धानंद
स्वामी श्रद्धानंद ने 1902 के आसपास उस समय जनपद में शामिल कांगड़ी गांव में गुरुकुल का निर्माण कराया था। उन्होंने सबसे पहले उच्च शिक्षा में हिंदी की पुस्तकों से पढ़ाई शुरू कराई थी। अंग्रेजी माध्यम से पढ़ाई जाने वाली यूरोप विश्वविद्यालय की पुस्तकों का हिंदी में अनुवाद कराया था। उच्च शिक्षा में गुरुकुल कांगड़ी से शुरू हुआ हिंदी पाठ्यक्रम का सिलसिला पूरे देश में फैल गया।
दुष्यंत कुमार
हिंदी गजलकार दुष्यंत कुमार का जन्म एक सितंबर सन 1933 को बिजनौर जिले के ग्राम राजपुर नवादा में हुआ था। दुष्यंत कुमार ने सबसे पहले हिंदी में गजल लेखन किया। आम बोलचाल की भाषा में लिखी गईं उनकी गजलें सड़क से संसद तक पढ़ी जाती हैं। हिंदी साहित्य के इतिहास में दुष्यंत कुमार का नाम स्वर्ण अक्षरों में लिखा है।
डॉ. महावीर अधिकारी ने हिंदी में किया लेखन
जिले के ग्राम पैगंबरपुर में एक जनवरी 1918 को जन्में डॉ. महावीर अधिकारी ने हिंदी की विभिन्न विधाओं में लेखन किया। उन्होंने निबंध, उपन्यास, कहानी, जीवनी के साथ-साथ कई पुस्तकों का अनुवाद भी किया।
पदम सिंह शर्मा
जिले के ग्राम नायक नगला में जन्मेें पंडित पदम सिंह शर्मा ने हिंदी साहित्य को समृद्ध किया। उन्होंने बिहारी सतसई तुलनात्मक अध्ययन, बिहारी सतसई संजीवन भाष्य आदि पुस्तकों की रचना की।