मेरठ। राशन की कालाबाजारी का खेल बहुत पुराना है। सत्ता किसी की भी रही हो, लेकिन कालाबाजारी आज तक नहीं रुकी। इस खेल से जुड़े लोगों को हर सरकार में संरक्षण देने वाला कोई न कोई मिल ही जाता है। इसके पीछे बड़ा नेटवर्क है, जो हर काम में शामिल है। चाहे राशन एजेंसी का निलंबन हो, उसे दूसरी एजेंसी से संबद्ध कराना हो या राशन की कालाबाजारी। पूरे खेल में आपूर्ति विभाग के अधिकारी और नेता राशन डीलरों के साथ मिलकर राशन माफिया को संरक्षण देेते हैं।
गोदाम से लेकर दुकान तक फैला जाल
राशन की कालाबाजारी गोदाम से ही शुरू हो जाती है। यहां सेटिंग के तहत पहले ही राशन डीलरों को कम राशन दिया जाता है। बचा राशन माफिया को बेच दिया जाता है। जहां पर सख्ती और जांच का अंदेशा होता है, वहां के राशन डीलर को पूरा माल दिया जाता है। बाद में राशन डीलर के यहां राशन को बांटने में होने वाले खेल के बाद माफिया के हाथों बेच दिया जाता है।
सबसे ज्यादा गेहूं की कालाबाजारी
सबसे ज्यादा कालाबाजारी गेहूं की होती है। यह गेहूं आटा मिलों में जाता है। सरकारी सस्ते गेहूं की खरीद में पूरा गिरोह सक्रिय रहता है। जनपद में दो-तीन बड़े राशन माफिया हैं। इनकी सेटिंग सत्ता के साथ बदलती रहती है। यदि कोई राशन डीलर इनके खिलाफ आवाज उठाता है तो झूठी शिकायतें कर उसकी एजेंसी को निलंबित कराकर अपनी खास एजेंसी से संबद्ध करा देते हैं। इस पूरे गोरखधंधे में आपूर्ति विभाग, विकास खंड स्तरीय अधिकारी और तहसील अधिकारी शामिल होते हैं। जबकि पूरा संरक्षण सत्ता पक्ष के कुछ जनप्रतिनिधि और नेता देते हैं।
कई बार सांठगांठ आई सामने
सत्ता पक्ष के लोगों की साठगांठ कई बार सामने आई है। दो साल पहले ही सदर थाना क्षेत्र में हस्तिनापुर क्षेत्र से भारी मात्रा में गेहूं बिकने आया था। पकड़ में आने के बाद दो जनप्रतिनिधियों के साथ सत्ता पक्ष के नेता सक्रिय हो गए और राशन माफिया को बचा ले गए।
जांच के बावजूद चल रहा है खेल
प्रदेश स्तर पर राशन की कालाबाजारी को लेकर जांच चल रही है। भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष डॉ. लक्ष्मीकांत वाजपेयी पूरे खेल के खुलासे पर डटे हैं। उन्हीं की मांग पर जांच भी चल रही है। इसके बाद भी राशन की कालाबाजारी रोके नहीं रुक रही है।
बाक्स में लगाएं=========
सत्ता पक्ष के नेताओं ने बनाया था दबाव
सप्ताह भर पहले थाना सदर पुलिस ने गांव किनोनी निवासी एक व्यक्ति को गेहूं के बोरों से भरी ट्रैक्टर ट्रॉली के साथ पकड़ा था। पहले जांच में सामने आया था कि उक्त व्यक्ति किसान तो है, लेकिन ट्रैक्टर ट्रॉली का प्रयोग भाड़े पर करता है। कुछ ग्रामीणों ने यह भी बताया कि कि वह आसपास इलाके से गेहूं खरीदकर बाजार में बेचता है। ग्राम प्रधान के पुत्र ने भी सरकारी राशन खरीदने और उसे बाजार में बेचने के आरोप लगाए थे। मामले में जांच चल रही थी, लेकिन सत्ताधारी नेताओं के दबाव में पूरा मामला पलट दिया गया। पकड़ा गया गेहूं उक्त व्यक्ति के खेत की उपज बताकर उसे लौटा दिया गया।
लेखपाल की तेजी पर सभी हैरान
यदि प्रमाण पत्र पर जांच रिपोर्ट लगनी होती है तो लेखपाल 15 दिन तक का समय लगा देते हैं। किसी मामले में अधिकारी के आदेश के बाद भी जांच रिपोर्ट 5-6 दिन से पहले नहीं देते। लेकिन किनोनी मामले में लेखपाल ने एक दिन के भीतर ही अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत कर सभी को चौंका दिया।