एक समय देश के किसान आंदोलन का पर्याय मानी जाने वाली भाकियू की एक आवाज पर सरकारों का पसीना छूट जाता था। पैनी की ठोड़ पर हक हासिल करने की बात कहने वाले बाबा टिकैत की हुंकार पर देशभर के किसान इकट्ठा हो जाया करते थे। भाकियू बाबा के निधन से काफी कमजोर नजर आने लगी थी। हालांकि उनके बड़े बेटे और भाकियू के राष्ट्रीय अध्यक्ष नरेश टिकैत और राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत के नेतृत्व में संगठन की तरफ से किसानों की आवाज उठती रही है। लेकिन गत 23 सितंबर को हरिद्वार के टिकैत घाट से शुरू हुई किसान क्रांति पदयात्रा ने भाकियू के सफल आंदोलनों की याद दिला दी है।
विपक्ष के लिए प्लेटफार्म तैयार कर रही यात्रा
गन्ना बकाया भुगतान, फसल का डेढ़ गुणा दाम, कर्जमाफी और पुराने ट्रैक्टरों के संचालन पर लगी रोक हटाने आदि मांगों को लेकर चल रही इस यात्रा से जहां भाजपा की केंद्र व प्रदेश सरकार पर दबाव बन रहा है। वहीं भाजपा के खिलाफ लामबंद होते किसान संगठनों से विपक्षी दलों की बांछें खिली हैं। हाइवे पर कई किलोमीटर लंबी इस यात्रा और उसमें शामिल किसानों को पैदल चलते देख लोग भी सरकार को कोसते नजर आ रहे हैं।
भाकियू न केवल किसानों का अराजनैतिक संगठन है बल्कि इस संगठन में तमाम बिरादरियों के लोगों को पदाधिकारी बनाया गया है। लेकिन टिकैत बंधुओं के जाट बिरादरी से होने के चलते इस पर कुछ लोग जाटों का संगठन होने का भी तंज कसते आए है। हालांकि संगठन के चरित्र से कभी ऐसा दिखा नहीं। बाबा टिकैत ताउम्र किसानों की लड़ाई लड़ते रहे।
किसान आंदोलन के साथ भोपा में नईमा कांड के खिलाफ भी कई दिन तक आंदोलन किया। किसान क्रांति पदयात्रा से जहां किसान संगठित होता दिखाई दे रहा है वहीं मुजफ्फरनगर दंगे के बाद खेमेबंदी में बंटी जाट बिरादरी भी संगठित नजर आ रही है। सियासी पंडितों का कहना है कि यात्रा से भाकियू को संजीवनी मिली है, इसके दूरगामी परिणाम भी देखने को मिलेंगे।
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