हस्तिनापुर सेंचुरी का इलाका हो या फिर मेरठ में शोभापुर, काली पलटन मंदिर से कैंट स्टेशन और लाल क्वार्टर के आसपास समेत कई दूसरे इलाके। सुबह, शाम-रात को यहां पेड़ों पर आजकल कोयल सरीखी सुरीली आवाज मन मोह लेती है। पाइड क्रेस्टेड कुक्कू यानी चातक (पपीहा) को आजकल आप मेरठ के कैंट समेत कई दूसरे इलाकों में देख सकते हैं। इनकी मधुर आवाज सबका मन मोह रही है। अंडे देने के बाद सितंबर में ये परिंदे अपने वतन लौट जाएंगे।
पी...पी...जैसी आवाज निकालने वाला पपीहा यानी चातक साउथ अफ्रीका से अपने साथियों के साथ बारिश के साथ ही मेरठ में आ गए हैं। मादा कुक्कू ने यहां पर अंडे देने शुरू कर दिए हैं। सितंबर तक कुक्कू का ये दल मेरठ में ही प्रवास करेगा। इसके बाद ये सभी अपने सफर के लिए रवाना हो जाएंगे। जाने से पहले ये मेरठ में ही अपने अंडे छोड़ जाएंगे। यहां पर बैब्लर उनके अंडों की देखभाल करेगा।
कुक्कू के बच्चे भी दो महीने की उम्र होते ही मेरठ को अलविदा कहकर अपने माता-पिता के साथ वतन को रवाना हो जाएंगे। सीनियर ऑर्नीथोलॉजिस्ट रजत भार्गव बताते हैं कि कुक्कू को उत्तर भारत का मौसम बेहद भाता है। मेरठ में आजकल बड़ी संख्या में कुक्कू पक्षी को देखा जा सकता है। हर साल ये पक्षी यहां पर अंडे देने के लिए आते हैं।
खुद नहीं पालते अपने बच्चे
कुक्कू ऐसा पक्षी है जो दक्षिण एशिया में बड़ी संख्या में पाया जाता है। इसे मानसूनी पक्षी इसलिए कहा जाता है क्योंकि ये मानसून के समय दक्षिण अफ्रीका से पाकिस्तान और दक्षिण भारत और उत्तर भारत के इलाकों में अंडे देने के लिए आता हैं।
कोयल की तरह ये खुद अपना घोंसला नहीं बनाता न ही अपने चूजों को पालता है। कुक्कू मादा यहां के निवासी पक्षी जंगल बैब्लर (सतभैया) के घोंसले से अंडों को गिराकर अपने अंडे घोंसले में दे देती है। इसके अंडे का रंग बैब्लर के अंडों जैसा ही होता है। बैब्लर पक्षी कुक्कू के अंडों को अपना समझकर सेता है और उनके बच्चों का पालन पोषण करता है।
दो महीने के होते ही पक्षी चले जाते हैं अपने देश
सीनियर ऑर्नीथोलॉजिस्ट रजत भार्गव बताते हैं कि कुक्कू के बच्चे दो महीने के होते ही अफ्रीका चले जाते हैं। कुक्कू का बैब्लर के घोंसले में अंडे देने का कारण ये भी है कि बैब्लर पक्षी सात के ग्रुप में रहते हैं। उनमें से केवल एक ही जोड़ा अंडा देने का काम करता है। बाकी पांच बच्चों का पालन पोषण में सहायता करते हैं। इसलिए कुक्कू के बच्चों के पालन पोषण और अच्छे देखभाल की संभावना रहती है।
कुक्कू यानी पपीहा पेड़ से नीचे बहुत ही कम उतरता है। कहा जाता है कि पपीहा केवल वर्षा की बूंद का ही पानी पीता है। प्यास से मरने की स्थिति पर भी नदी, तालाब आदि के जल में चोंच नहीं डुबोता।