केस नंबर एक
सेवा बंद की तो बड़े भाई के बेटे के नाम कर दी वसीयत बड़ौत की पट्टी चौधरान के राजकुमार कहते हैं कि बेटे-बहू ने ध्यान रखना बंद कर दिया था। इसलिए पहले की वसीयत निरस्त कराकर संपत्ति बड़े भाई के बेटे के नाम करा दी। उनका कहना है कि माता-पिता जीवनभर बच्चों को पालते हैं, लेकिन बुढ़ापे में जब अपने ही देखभाल नहीं करते तो उन्हें संपत्ति के बारे में दोबारा सोचना पड़ता है।
केस नंबर दो
बेटे-बहू ने देखभाल नहीं की तो बेटी को बनाया वारिस बिजरौल के सुखबीर कहते हैं कि अपनी संपत्ति बेटी के नाम कर दी। बेटे-बहू से दो वक्त की रोटी की उम्मीद थी मगर वह भी नहीं मिली तो पहले की वसीयत निरस्त करा दी। बेटी ने साथ दिया तो उसे संपत्ति का वारिस बनाने का निर्णय लिया। उनका कहना है कि माता-पिता को बुढ़ापे में सहारे की जरूरत होती है। जब बेटा जिम्मेदारी नहीं निभाता तो बेटी भी माता-पिता की देखभाल करके उनका भरोसा जीत सकती है।
वसीयतनामा व्यक्ति की इच्छा के अनुसार तैयार किया जाता है। वसीयत करने वाला व्यक्ति अपने जीवनकाल में नियमानुसार इसे निरस्त कर सकता है या नई वसीयत बनवा सकता है। पिछले कुछ महीनों में ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जिनमें माता-पिता ने अपनी संपत्ति की वसीयत अपने बच्चों के बजाय किसी दूसरे व्यक्ति या बेटी के नाम करा दी है। -शुभ्रा राय, उप निबंधक, बड़ौत।