बहुजन समाज पार्टी के लिए सहारनपुर हमेशा से ही खास रहा है। यहां की विधानसभा रही हरोड़ा से पूर्व मुख्यमंत्री मायावती दो बार चुनाव लड़कर विधानसभा पहुंची और मुख्यमंत्री बनीं, जबकि कांशीराम ने भी सहारनपुर से एक बार लोकसभा चुनाव लड़कर बसपा की ताकत का अहसास कराया। 2012 में सपा की प्रदेश में रिकार्ड जीत के बावजूद बसपा का ही परचम लहराया, लेकिन इस बार बसपा की साख दांव पर लगी हुई है। इस पार्टी के दो मौजूदा विधायक, एक पूर्व विधायक पार्टी को अलविदा कह चुके हैं। जबकि अभी तक पार्टी डैमेज कंट्रोल नहीं कर पाई है।
सहारनपुर को बसपा का गढ़ माना जाता रहा है। 2012 के विधानसभा चुनाव में सपा की लहर के बावजूद बसपा ने यहां अप्रत्याशित प्रदर्शन किया। नकुड़ से धर्मसिंह सैनी, रामपुर से रविंद्र मोल्हू, बेहट से महावीर राणा और सहारनपुर देहात से जगपाल ने जीत का परचम लहराकर सहारनपुर में बसपा की हनक को बरकरार रखा। सहारनपुर बसपा के लिए इसलिए भी खास रहा है क्योंकि यहां की विधानसभा सीट रही हरोड़ा से पूर्व मुख्यमंत्री मायावती दो बार चुनाव जीत चुकीं हैं। पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने हरोड़ा सीट से 1996 में और 2002 में चुनाव में जीत हासिल की। इसके अलावा कांशीराम ने 1998 में सहारनपुर लोकसभा सीट से चुनाव लड़कर दमखम दिखाया। हालांकि वह भाजपा के नकली सिंह से कुछ ही मतों से पीछे रह गए थे। तब से ही यहां पर बसपा विधानसभा चुनावों में आगे रही है।
लेकिन इस बार विधानसभा चुनाव में बसपा की कड़ी परीक्षा होने जा रही है। इसका कारण बसपा के चार मौजूदा विधायकों में से दो विधायक महावीर राणा और धर्म सिंह सैनी पार्टी से अलविदा कह चुके हैं। इस बार दोनों ही भाजपा के प्रत्याशी के रूप में उन्हीं सीटों पर बसपा के प्रत्याशियों को टक्कर देंगे। इसके अलावा देवबंद से बसपा के विधायक रहे मनोज चौधरी भी बसपा का साथ छोड़ चुके हैं और फिलहाल भाजपा के टिकट पर चुनौती दे रहे हैं। हालांकि बसपा ने इस नुकसान की अनदेखी करते हुए अपने प्रत्याशियों को मैदान में उतार दिया है। बसपा में सहारनपुर में कोई भी बड़ा नेता किसी भी पार्टी से शामिल नहीं हुआ है, लेकिन पार्टी पदाधिकारी मानकर चल रहे हैं कि सहारनपुर में किसी व्यक्ति विशेष की बजाय पार्टी की अपनी छवि पर ही वोट मिला है।