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मेरठ से मिलेगी सेना को नई दिशा और ताकत

Wed, 15 May 2019 04:31 AM IST
Gaurav sharma न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मेरठ
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आर्मी - फोटो : अमर उजाला
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1857 की क्रांति का शहर मेरठ दुनिया की सबसे बड़ी फौज का प्रशिक्षण मुख्यालय बनने के बाद देश ही नहीं दुनिया में भी मशहूर होगा। देश के 32 ए श्रेणी के शिक्षण प्रतिष्ठानों के साथ ही देशभर में सेना की ट्रेनिंग में बदलाव से लेकर नई पॉलिसी यहीं से तय होगी। सेना के जवानों की ट्रेनिंग को और ज्यादा प्रभावशाली बनाने से लेकर सेना प्रशिक्षण और युद्ध से जुड़ी विभिन्न नीतियां बनाने में भी सेना का प्रशिक्षण कमान मुख्यालय ही निर्णय देगा।
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भारतीय सेना के पास एक रेजिमेंटल प्रणाली है जो विशिष्ट भौगोलिक स्थिति और संचालन के आधार पर सात कमानों में विभाजित है। प्रत्येक कमान (कमांड) लेफ्टिनेंट जनरल के पद के साथ जनरल ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ के नियंत्रण में होती है। देश में छह संचालन और एक प्रशिक्षण कमांड हैं। प्रत्येक सेना कमान सीधे नई दिल्ली स्थित सेना मुख्यालय से संबद्ध है। देश की इन सात कमानों में प्रशिक्षण मुख्यालय सबसे अहम है। पूरे देश में 32 ए श्रेणी के शिक्षण प्रतिष्ठानों जिनमें आईएमए, एनडीए शामिल हैं। कॉर्प्स बैटल स्कूल में होने वाली विशेष ट्रेनिंग का पूरा खाका भी यहीं से तय होता है। सभी यूनिटों के ट्रेनिंग सेंटर को निर्देश भी प्रशिक्षण मुख्यालय से ही दिए जाते हैं। सेना की तमाम यूनिटों में चलने वाले ट्रेनिंग सेंटर और ट्रेनिंग के लगातार बदलते स्वरूप को लेकर पॉलिसी भी यहीं से बनाकर भेजी जाती है। प्रशिक्षण मुख्यालय होने के कारण दूसरे देशों के ऑफिसर की ट्रेनिंग और दूसरे मामलों के चलते उनका आना-जाना रहता है।
हाल ही में सेनाध्यक्ष आए थे मेरठ
देश की 62 छावनियों में मेरठ बेहद अहम है। यहां पर सेना के पास जमीन की भी कोई कमी नहीं है। दिल्ली के सबसे नजदीक है। कुछ दिन पहले ही सेनाध्यक्ष बिपिन रावत मेरठ आए थे। जनरल रावत ने घंटों चले निरीक्षण के दौरान फॉॅर्मेशन के युद्ध संबंधी तत्परता की समीक्षा और युद्ध संबंधी तैयारियों, वर्तमान सुरक्षा स्थिति तथा फॉर्मेशन के विशेष प्रशिक्षण के बारे में बात की थी।
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सेना के पुनर्गठन की चल रही कवायद
सेना के पुनर्गठन को लेकर सैन्य अफसर लगातार अध्ययन करते रहे हैं। इस कड़ी में पूरी कवायद चल रही है। इसमें ब्रिगेडियर के पद को खत्म करने के साथ ही सैन्य बल को घटाने और सैनिकों को विशेष प्रशिक्षण एवं हथियारों की खरीद को लेकर सर्र्वोच्च जनरलों के नेतृत्व में अध्ययन हो रहा है। इसी के तहत दिल्ली सेना मुख्यालय के नजदीक होने की वजह से मेरठ छावनी को इसके लिए चुना गया है।


सात कमान और उनके मुख्यालय
प्रशिक्षण कमान
मुख्यालय:  शिमला, हिमाचल प्रदेश
सेना का प्रशिक्षण कमान मुख्यालय इस समय शिमला, हिमाचल प्रदेश में है। इसे एआरटीआरएसी के रूप में भी जाना जाता है। आर्मी ट्रेनिंग कमांड 1 अक्टूबर 1991 को स्थापित की गई थी। यह पहले मध्य प्रदेश के महू क्षेत्र में स्थित था। लेकिन सन 1993 में हिमाचल प्रदेश के शिमला में स्थानांतरित कर दिया गया। कमांड का मुख्य उद्देश्य अधिकारियों को प्रशिक्षण प्रदान करने के साथ ही प्रशिक्षण की कार्य साधकता बढ़ाने और तमाम पॉलिसी तय करना है।
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सेंट्रल कमांड
मुख्यालय: लखनऊ, उत्तर प्रदेश
लखनऊ में स्थित सेंट्रल कमांड की स्थापना द्वितीय विश्व युद्ध के समय 1942 में हुई थी। 1946 में इसे बर्खास्त कर दिया गया। चीन-भारतीय युद्ध के कारण 1 मई 1963 को फिर से इसे स्थापित किया गया।
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पूर्वी कमान
मुख्यालय: कोलकाता, पश्चिम बंगाल
भारतीय सेना के पूर्वी कमान का गठन 1920 में हुआ था। उस समय सेना के दक्षिणी कमान, पूर्वी कमान, उत्तरी कमान और पश्चिमी कमान थे। 1 मई 1963 तक लखनऊ को पूर्वी कमान के मुख्यालय के रूप में चुना गया था। जब सेंट्रल कमांड को फिर से स्थापित किया गया तब लखनऊ को पूर्वी कमान के बजाय सेंट्रल कमांड का मुख्यालय बनाया गया था। पूर्वी कमान का मुख्यालय कोलकाता पश्चिम बंगाल में है।
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उत्तरी कमान
मुख्यालय: उधमपुर, जम्मू और कश्मीर
भारतीय सेना में उत्तरी कमान सबसे पुरानी कमांड में से एक है। यह मूल रूप से ब्रिटिश शासन के समय 1895 में स्थापित की गई थी। 1942 में कोहट, बलूचिस्तान, पेशावर, वजीरिस्तान और रावलपिंडी जिले सहित क्षेत्र उत्तरी कमान के नियंत्रण में थे। 1947 में उत्तरी कमान का मुख्यालय पाकिस्तानी सेना का मुख्यालय बन गया। उत्तरी कमान को भारत की स्वतंत्रता के बाद 1947 में हटा दिया गया था। जब भारत सरकार ने उत्तरी सीमाओं में संचालन की देखरेख के लिए एक अलग कमान बनाने का फैसला किया तो 1972 में कमान में सुधार किया गया।
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दक्षिणी कमान
मुख्यालय: पुणे, महाराष्ट्र
दक्षिणी कमान की स्थापना 1895 में की गई थी। यह 1942 में ब्रिटिश द्वारा द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान दक्षिणी सेना के रूप में फिर से बनाया गया था। कमांड का गठन नवंबर 1945 में मूल नाम दक्षिणी कमान के साथ फिर से वापस कर दिया गया। दक्षिणी कमान ने आधुनिक भारत में विभिन्न रियासतों के एकीकरण, 1961 में गोवा के भारतीय उद्घोषण और 1965 और 1971 में भारत-पाकिस्तान युद्धों के दौरान भारत में होने वाली विभिन्न महत्वपूर्ण घटनाओं के दौरान अनुयोजन देखा गया।
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दक्षिण पश्चिमी कमान
मुख्यालय: जयपुर, राजस्थान
15 अप्रैल 2005 को गठित भारतीय सेना की दक्षिण पश्चिमी कमान 15 अगस्त 2005 को पूरी तरह से चालू हो गई। यह भारतीय सेना में सबसे नई गठित कमांड है। राजस्थान की राजधानी जयपुर में स्थित इस कमान में कुछ परिचालन इकाइयां हैं जिन्हें पश्चिमी कमान से स्थानांतरित किया गया था।
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पश्चिमी कमान
मुख्यालय: चंडी मंदिर, चंडीगढ़
भारतीय सेना के पश्चिमी कमान को 26 अक्टूबर 1947 को प्रभावी बनाया गया था। जम्मू और कश्मीर के विलय के बाद पश्चिमी कमान के क्षेत्र को जब्त करने के लिए भारतीय सेना को संचालन की जिम्मेदारी लेने का कार्य सौंपा गया था।

मेरठ के लिए बड़ी बात, दुनियाभर में होगा नाम  
श्रीनगर में पंपोर के पास सेना के खास स्कूल 15 कॉर्प्स बैटल स्कूल फाउंडर कमांडेंट रहे रिटायर कर्नल सतीश चंद्र त्यागी बताते हैं कि इसके आने मेरठ में इन्फ्रास्ट्रक्चर काफी डेवलप होगा। एयर फील्ड की भी विजिट बढ़ेगी। यह भविष्य के लिए मेरठ में बड़ा संकेत हैं। दुनिया भर की आर्मी का भी केंद्र रहेगा।


इसका प्रधानमंत्री को श्रेय  
सेना का प्रशिक्षण कमान मुख्यालय मेरठ में ट्रांसफर होना मेरठ के लिए बहुत गौरव की बात होगी। इससे मेरठ के विकास में जहां गति आएगी, वहीं मेरठ के लिए यह गौरवशाली उपलब्धि होगी। इसके लिए पूरी तरह से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को श्रेय जाता है, जिन्होंने मेरठ से कनेक्टिविटी इतनी सहज कर दी कि सेना मुख्यालय ने इस तरफ गंभीरता से ध्यान दिया। -राजेंद्र अग्रवाल, सांसद
यह गौरव की बात
मेरठ का छावनी क्षेत्र देश के बड़े छावनी क्षेत्र में आता है। क्रांति धरा पर सेना का प्रशिक्षण कमान मुख्यालय स्थापित होना पूरे मेरठ वासियों के लिए गौरव की बात है। इसके लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय सड़क एवं परिवहन मंत्री नितिन गड़करी को श्रेय जाता है, जिन्होंने एनसीआर में विकास को इतनी तेज गति दी कि मेरठ में यह प्रशिक्षण कमान मुख्यालय आ रहा है। -विजयपाल सिंह तोमर, राज्यसभा सदस्य

कनेक्टिविटी सुधरने के साथ ही देश के फलक पर चमकेगा मेरठ  
 वो दिन दूर नहीं जब मेरठ भी देश के नक्शे पर अपनी अलग पहचान रखता हुआ नजर आने लगेगा। दिल्ली से मेरठ की कनेक्टिविटी बढ़ाने के लिए मेरठ-दिल्ली एक्सप्रेस वे पर पांच वर्षों में तेज गति से काम शुरू हुआ। अगले पांच वर्षों में इन कार्यों को पूरा कर मेरठ की पहचान पूरे देश में होगी। जिससे यहां रोजगार के साथ-साथ सुरक्षा क्षेत्र में भी इसका रुतबा बढ़ने वाला है। हाल ही में शिमला से सेना का प्रशिक्षण कमान मुख्यालय मेरठ स्थानांतरित किया जा रहा है। इससे मेरठ का नाम भी देश में सुरक्षा सेंटरों की सूची में सबसे ऊपर रहेगा।
 मेरठ कनेक्टिविटी के मामले में एनसीआर में सबसे आगे होने जा रहा है। रैपिड रेल, एक्सप्रेस-वे, डेडिकेटेड-फ्रेट कॉरिडोर प्रोजेक्ट शहर को नई गति की ओर ले जाने के लिए प्रयासरत हैं। जिससे शहर में कई नए प्रोजेक्ट आने की आस जगी है। वहीं, कनेक्टिविटी सुधरने के बाद अपने शहर में भी रोजगार के साधन बढ़ने लगेंगे। हालांकि, पहले भी मेरठ का नाम देश-विदेश में अलग-अलग क्षेत्र में छाया रहा है। लेकिन दिल्ली से मेरठ की दूरी कम न होने की वजह से यह शहर गाजियाबाद से पीछे रह गया।
कई अन्य प्रोजेक्ट की भी आस
सेना के प्रशिक्षण कमान मुख्यालय के मेरठ आने के बाद यहां देश के सभी सुरक्षा एजेंसियों की नजरें लग जाएंगी। मेरठ से दिल्ली की दूरी को कम करने के लिए कनेक्टिविटी पर तेजी से कार्य होगा। इसके अलावा मेरठ में काफी समय से फूड पार्क की मांग भी पुरजोर ढंग से उठती आ रही है। इसके अलावा वेदव्यासपुरी में बन रहे आईटी पार्क से भी इस क्षेत्र को रफ्तार मिलेगी। यहां भी देश की टॉप कंपनियां युवाओं को रोजगार देंगी।
एक घंटे में राजधानी का सफर
अगले एक साल के अंदर मेरठ से दिल्ली का सफर मात्र एक घंटे में पूरा हो सकेगा। राजधानी से विभिन्न मामलों में होने वाले संवाद को भी रफ्तार मिलेगी। वहीं, कई अन्य प्रोजेक्ट पर भी रफ्तार के साथ कार्य हो सकेगा। दिल्ली-मेरठ एक्सप्रेस-वे पर छह माह में वाहन फर्राटा भर सकते हैं।
सभी प्रोजेक्ट पर कार्य प्रगति पर
शुभ संकेत यह माना जा रहा है कि कनेक्टिविटी के सभी प्रोजेक्ट पर तेज गति से कार्य चल रहा है। प्रोजेक्ट के पूरा होने की डेडलाइन तिथि को आधार मानकर कार्य किया जा रहा है। जिससे तय समय में इन्हें पूरा किया जा सके। इन प्रोजेक्ट के पूरा होते ही मेरठ की इंडस्ट्री, प्रॉपर्र्टी सहित अन्य कार्यों में बूम आएगा।

कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट पर एक नजर
एक्सप्रेस वे का सफर: दिल्ली-मेरठ
कुल किलोमीटर - 96 किमी (चार चरण)
अनुमानित लागत - आठ से दस हजार करोड़

रैपिड रेल : दिल्ली-मेरठ रैपिड रेल
कुल किलोमीटर - 82 किमी
कुल बजट - 30 हजार 874 करोड़

डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर
कुल किलोमीटर - 1856 किमी
यह मिलेगा लाभ - इस प्रोजेक्ट के बन जाने से कोयला, स्टील आदि सामान को आसानी से भेजा जा सकेगा
पूरा होने का लक्ष्य - साल 2021
कुल बजट - 81 हजार 459 करोड़ (ईस्टर्न और वेस्टर्न डेडिकेटेड  फ्रेट कॉरिडोर के लिए)


कनेक्टिविटी से कई अन्य बड़ी योजनाओं पर भी होगा काम  
मेरठ से दिल्ली तथा अन्य शहरों की कनेक्टिविटी शानदार होगी तो कई बड़े औद्योगिक घराने भी इस तरफ आकर्षित होंगे। इसी कनेक्टिविटी के चलते अडानी ग्रुप भी मेरठ में अपना प्रोजेक्ट लगाने की इच्छा जाहिर कर चुका है।
इस समय मेरठ एनसीआर का बेहतर शहर बनने की दौड़ में है। कई योजनाओं पर काम चल रहा है। सबसे अहम है कनेक्टिविटी। मेरठ की कनेक्टिविटी दिल्ली ही नहीं बल्कि देश के अन्य शहरों से भी बेहतर होने जा रही है। इसी का परिणाम है कि यहां बड़े घराने भी निवेश की इच्छा जाहिर कर रहे हैं। मेरठ में लॉजिस्टिक कॉरिडोर विकसित करने की अडानी ग्रुप इच्छा जाहिर कर चुका है। इतना ही नहीं, ग्रुप के प्रतिनिधि एमडीए अधिकारियों से इस बाबत बात भी कर चुके हैं और शताब्दीनगर में लोकेशन भी एक बार देख चुके हैं। इस ग्रुप ने यहां काम किया तो यह मेरठ के विकास में अहम होगा। इसके अलावा फूड चेन पर भी बात हो रही है। साथ ही एजुकेशन हब की ओर भी मेरठ तेजी से आगे बढ़ सकता है। आईटी पार्क तो यहां पहले ही बन रहा है। सबसे अहम रहेगा कि बेहतर टाउनशिप की ओर मेरठ के कदम तेजी से बढे़ंगे। मल्टी स्टोरी बिल्डिंग बनेंगी और डेवलेपर मेरठ की ओर आकर्षित होंगे। इस श्रंखला की तैयारी एमडीए भी कर रहा है।
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