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मायाचारी से दूर हो जानाही आर्जव धर्म : गणिनी प्रमुख ज्ञानमती माता

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जंबूद्वीप में पूजा अर्चना करते श्रद्धालु। - फोटो : MAWANA
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हस्तिनापुर। जम्बूद्वीप स्थित चारित्र चक्रवर्ती आचार्य शांतिसागर प्रवचन हाल में चल रहे इंद्रध्वज मंडल विधान में मंगलवार को चंद्रप्रभु मंदिर में भगवान चंद्रप्रभु की प्रतिमा का महामस्तकाभिषेक किया गया। इसमें पंचामृत महामस्तकाभिषेक विजय कुमार और रश्मि जैन ने किया। दशलक्षण महापर्व के तहत मंगलवार को तीसरे दिन दिवस उत्तम आर्जव धर्म का महत्व बताया गया।
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इंद्रध्वज विधान के तहत विजयमेरू का पूजन हुआ। इसमें 78 अर्घ्य मंडल पर समर्पित किए गए। इंद्रध्वज की रचना में पांच मेरू सुदर्शन, विजय, अचल, मंदर, विद्युन्माली होते हैं। मध्यान्ह में बीना दीदी ने सरस्वती पूजन संपन्न कराया। और प्रज्ञाश्रमणी आर्यिका चंदनामती माता ने तत्तवार्थसूत्र के तृतीय अध्याय की वाचना अर्थ समेत की। शांतिधारा के मंत्रों उच्चारण संस्थान के अध्यक्ष पीठाधीश स्वस्ति रवीन्द्रकीर्ति स्वामी ने किया।
गणिनीप्रमुख ज्ञानमती माता ने उत्तम आर्जव धर्म की व्याख्या की। उन्होंने कहा कि मायाचारी से दूर हो जाना ही आर्जव धर्म है। जो महामुनि मायाचारी से दूर होकर अपने मन-वचन और कार्य को सरल कर लेते हैं वे ही अपनी आत्मा में एकाग्रचित्त हो पाते हैं। अत्यंत समता भाव के साथ अध्यात्मरूपी अमृत रस का पान करते हैं। ऐसे महामुनियों को समस्त कर्मों से छूटकर सीधे सिद्ध गति प्राप्त हो जाती है। आर्जव का अर्थ है कि व्यक्ति जो नहीं है, वह दिखाने की कोशिश करता है। दर्शन को प्रदर्शन के रूप में करना ही मायाचारी है। कार्यक्रम का विधि विधान प्रतिष्ठाचार्य विजय जैन, प्रवीणचंद जैन की ओर से कराया जा रहा है। सायंकाल सत्र में मंडल विधान की, भगवंतों की आरती की गई। प्रश्नमंच एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम की प्रस्तुति जम्बूद्वीप परिवार के बच्चों ने किया।
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