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Meerut News: कुशोत्पाटिनी अमावस्या आज, साल में एक दिन ही कुश ग्रहण करने का विधान

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कुशोत्पाटिनी अमावस्या पर स्नान-दान, तर्पण और धार्मिक अनुष्ठानों का विशेष महत्व
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भाद्रपद अमावस्या पर पूरे वर्ष के धार्मिक कार्यों के लिए कुश एकत्र करने की परंपरा
माई सिटी रिपोर्टर
मेरठ।
भाद्रपद मास की अमावस्या 10 सितंबर को कुशोत्पाटिनी या कुशाग्रहणी अमावस्या के नाम से जाना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन विधिपूर्वक कुश (दर्भा घास) को धरती से ग्रहण करने का विधान है। ज्योतिषाचार्य विनोद त्यागी ने बताया कि इसी दिन प्राप्त की गई कुश का उपयोग वर्षभर श्राद्ध, तर्पण, यज्ञ, हवन, पूजा और अन्य वैदिक अनुष्ठानों में किया जाता है। इस दिन स्नान-दान, जप, तप, व्रत और पितरों के तर्पण का भी विशेष महत्व माना गया है।
इंडियन काउंसिल ऑफ एस्ट्रोलॉजिकल साइंस के सचिव आचार्य कौशल वत्स ने बताया कि धार्मिक मान्यता है कि कुश सामान्य घास नहीं, बल्कि पवित्र वनस्पति है। पूजा-पाठ में कुश के आसन, पवित्री तथा पूजन सामग्री को अभिमंत्रित करने सहित अनेक कार्यों में इसका प्रयोग किया जाता है। शास्त्रीय मान्यता के अनुसार कुश के बिना किए गए कुछ धार्मिक कर्मों को पूर्ण नहीं माना जाता। इसी कारण वर्षभर के धार्मिक कार्यों के लिए कुशोत्पाटिनी अमावस्या पर कुश ग्रहण करने की परंपरा चली आ रही है।
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आचार्य मनीष स्वामी ने बताया कि कुश से जुड़ी एक धार्मिक कथा के अनुसार, जब भगवान विष्णु ने वराह अवतार धारण कर धरती को रसातल से बाहर निकाला, तब उनके शरीर से गिरे जल की बूंदों से कुशा की उत्पत्ति हुई। तभी से इसे पवित्र और पूजनीय माना जाने लगा।
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मान्यता के अनुसार अमावस्या के दिन स्नान आदि के बाद शुद्ध स्थान पर जाकर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके दाहिने हाथ से कुश ग्रहण करनी चाहिए। कुश तोड़ते समय उसके पूर्ण रूप से हरा-भरा और बिना कटा-फटा होने का ध्यान रखना चाहिए। कुश ग्रहण करते समय ‘ॐ हूं फट्-फट् स्वाहा’ मंत्र का जाप करने की परंपरा भी बताई गई है। धार्मिक विश्वास है कि इस दिन विधिपूर्वक किए गए दान-पुण्य, तर्पण और साधना से जीवन की बाधाओं तथा कर्ज आदि से मुक्ति का मार्ग प्रशस्त होता है।
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